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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
यथैषां वक्तुमिच्छन्ति नैर्गुण्यमनुय़ुञ्जकाः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं कुरुवृद्धेन भीष्मेणामिततेजसा ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्यं लिङ्गधारणे ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं जामदग्न्येन भूय़ानेव ततोऽर्जुनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद्भरतर्षभ ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
यथोक्तं तत्र तैस्तस्मिंस्ततः पञ्चगुणाधिकम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाज्ञापितवान्नृपः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
यथोक्तं दूत आचष्टे वध्यः स्यादन्यथा व्रुवन् ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
यथोक्तं नारदवचश्चिन्तय़न्ती सुदुःखिता ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत्कृतम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
यथोक्तं भवतामेतद्वचो मे प्रतिपादितम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
यथोक्तं मुनिना चापि तथा तदभवन्नृप |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तं राजपुत्रेण सर्वं चक्रे पुरोचनः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
यथोक्तं वरुणेनाजौ तथा स निधनं गतः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यथोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तः सञ्जय़श्चैव तच्च सर्वं श्रुतं त्वय़ा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
यथोक्तकारिणः सर्वे गच्छन्ति परमां गतिम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
यथोक्तकारी प्रिय़कृत्तृतीय़ः पाद उच्यते ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्कं शुल्कोपजीविभिः ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
यथोक्तमृषिभिस्तात साङ्ख्यस्यास्य निदर्शनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
यथोक्तमेतत्पूर्वं यो नानुतिष्ठति जापकः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
यथोक्तमेव कल्याणि सर्वमेतद्भविष्यति |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तवांस्त्वां भगवाञ्शतक्रतुररिन्दम |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
यथोक्तवादी स्मृतिमान्दूतः स्यात्सप्तभिर्गुणैः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यथोक्तवृत्तेर्वीरस्य क्षेमाश्रमपदं भवेत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
यथोक्ता व्रह्मकन्येति लक्ष्मीर्नीतिः सरस्वती |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
यथोक्तैर्लोकविख्यातैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
यथोक्तो धर्मपुत्रेण व्रजन्स स्वपुरीं प्रति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
यथोचितं च स वको यय़ौ व्रह्मसदस्तदा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोचितं पुत्र मय़ापि चोक्तं; समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
यथोचितं महाराज यशसा नावसीदति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
यथोचितं स्वकं भागं लभेमहि परन्तप |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोचितान्भवनवरान्समाविश; ञ्श्रमान्विता मृगपतय़ो गुहा इव ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
यथोत्पन्नाः स्ववर्णस्थास्ता नीता नान्यवर्णताम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
यथोत्साहं च समरे जघ्नुर्लोकं महारथाः ||
३० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
यथोदपाने महति सर्वतः सम्प्लुतोदके |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
यथोदाहृतमेतत्ते मय़ि नाम महामुने |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
यथोदाहृतमेतत्ते मय़ि नाम महामुने |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
यथोदाहृतमेतत्ते मय़ि नाम महामुने |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
यथोदाहृतमेतत्ते मय़ि नाम महामुने |
३८ क
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
यथोद्दिष्टं चराः सर्वे मृगय़न्तु ततस्ततः |
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
यथोद्दिष्टान्यनीकानि प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यथोद्देशं च गच्छामः सहिताः सर्वकौरवैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
यथोद्वृत्तं धारय़ते वेला वै सलिलार्णवम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
यथोदय़गिरौ द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते |
४ क