chevron_left  युय़ुधानस्यarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानस्य राजेन्द्र मनसेदमचिन्तय़त् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानाद्य युद्धे मे दृश्यते विजय़ो ध्रुवः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानेन च तथा तथैव च युय़ुत्सुना ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
युय़ुधानेन वीरेण धृष्टद्युम्नेन चैव ह ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानेन वै द्रौणिः प्रहसन्वाक्यमव्रवीत् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानेन सहितः प्रद्युम्नेन गदेन च |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
युय़ुधानो न शकितो हन्तुं यः पुरुषर्षभः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानो महाराज यन्तारमिदमव्रवीत् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानोऽपि राजेन्द्र द्रोणानीकाद्विनिःसृतः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधुः पाण्डवाश्चैव कौरवाश्च महारथाः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधे तावकान्निघ्नंस्त्वरमाणः पराक्रमी ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनामित्रघातिना ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधे पाण्डवैः सार्धमुन्मत्तवदहःक्षय़े ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधे पाण्डुभिः सार्धं कर्णस्याप्याय़यन्वलम् ||
६९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधे भरतश्रेष्ठ वज्रदत्तो महीपतिः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधे भ्रातुरर्थाय़ पाण्डवेन महात्मना ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
युय़ुधे युद्धवेलाय़ां स्ववाहुवलमाश्रितः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधे रथिनां श्रेष्ठश्चित्रं लघु च सुष्ठु च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधे राक्षसेन्द्रेण वकभ्रात्रा घटोत्कचः |
४ ख
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
युय़ुधे लक्ष्मणश्चैव तथैवेन्द्रजिता सह ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ोज ह यथाय़ोगमधिकारेष्वनन्तरम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
यूथपौ वाशिताहेतोः प्रय़ुद्धाविव कुञ्जरौ ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
यूथमध्ये महाराज विचरन्तौ कृतान्तवत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
वृहदश्व उवाच
यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
यूथानीव किशोरीणां सुकेशीनां जनार्दन |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
यूनः सहसमासीनान्वृद्धानभिगतान्सतः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यूनः स्थविरवालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः |
११८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
यूनश्चाभ्यवदन्पार्थाः प्रतिपूज्य यथावय़ः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
यूनां प्रीतिकरो राजन्सम्वभौ विपुलौजसः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
यूपं छिन्दन्ति यज्ञार्थं तत्र ये परिपन्थिनः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
यूपं प्रदक्षिणं कृत्वा वाजपेय़फलं लभेत् ||
७५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
यूपं सोमं तथैवेह त्रिदशाप्याय़नं मखे ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
यूपकेतो समीक्ष्य त्वं न मां गर्हितुमर्हसि |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
यूपप्रकारा वहवो वृक्षाश्चेमे विशां पते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
शक्र उवाच
यूपस्तवासीत्सुमहान्यजतः सर्वकाञ्चनः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
यूपा मणिमय़ास्तत्र चित्याश्चापि हिरण्मय़ाः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
यूपांश्च शास्त्रपठितान्दारवान्हेमभूषितान् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
यूपाः समुपकल्पन्तामस्मिन्यज्ञे जनार्दन ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
यूपेषु निय़तं चासीत्पशूनां त्रिशतं तथा |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
यूपोलूखलिनस्तात गच्छन्त्यवभृथाप्लवम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं च विवुधश्रेष्ठा मां यजध्वं समाहिताः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
यूय़ं चाप्यपराध्येय़ुर्दर्पमोहसमन्विताः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
यूय़ं जिज्ञासवो भक्ताः कथं द्रक्ष्यथ तं प्रभुम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
यूय़ं ततो धर्षिताः स्थ मय़ा पाण्डवनन्दन ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
यूय़ं तैर्ह्रिय़माणाश्च मोक्षिता दृढधन्वना ||
१७ ख