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उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
यश्च क्रुध्यत्यनीशः सन्स च मूढतमो नरः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
यश्च क्षत्रं रणे कृत्स्नं विजेष्यति समागतम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तय़न् |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
यश्च गोप्ता महेष्वासस्तस्य पापस्य दुर्मतेः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च गोवृषभाङ्कस्य प्रभावस्तं च मे शृणु |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ७४
शुक्र उवाच
यश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
यश्च तस्मात्परो राजा तेन सन्धिः प्रशस्यते ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च तान्सङ्गतान्सर्वान्पाण्डवान्वारणावते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यश्च तिक्तं कषाय़ं वाप्यास्वादविधुरं हितम् |
७६ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च तेषां प्रणेता वै वासुदेवो महावलः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
यश्च त्रय़ाणां वर्णानामिच्छेदाश्रमसेवनम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
यश्च त्वां सततं पश्येत्पुरुषश्चारुहासिनि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना |
९९ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यश्च दिष्टपरो लोके यश्चाय़ं हठवादकः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च द्रोणमुखान्दृष्ट्वा विमुखानर्दिताञ्शरैः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यश्च धर्मात्प्रविचलेल्लोके कश्चन मानवः |
१११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
यश्च न स्वमथादद्यात्त्याज्या नस्तादृशा इति ||
१८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च नागाय़ुतप्राणं वातरंहसमच्युतम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
यश्च नेच्छति न द्वेष्टि व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
यश्च नो व्राह्मणं हन्याद्यश्च नो व्राह्मणान्द्विषेत् |
३१ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च नोऽविदितं कुर्यात्पेय़ं कश्चिन्नरः क्वचित् |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
यश्च पाण्डवदाय़ादो हतः षड्भिर्महारथैः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च पौरजनः कश्चिद्द्रष्टुमिच्छति पार्थिवम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च भाग्यसमाय़ुक्तः स शुभं प्राप्नुय़ान्नरः ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
यश्च मानुषमात्रोऽय़मिति व्रूय़ात्सुमन्दधीः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च माय़ासहस्राणि ध्वंसय़ित्वा रणोत्कटम् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यश्च मे दक्षिणं वाहुं चन्दनेन समुक्षय़ेत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
व्रह्मो उवाच
यश्च योगे भवेद्भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशय़ः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यश्च राजा महोत्साहः क्षत्रधर्मरतो भवेत् |
१५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च वक्ष्यति सङ्ग्रामे तवास्मीति पराजितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ||
५४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
यश्च वेदप्रसूतात्मा स धर्मो गुणदर्शकः |
५२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
यश्च वैरार्थमुद्भूतः सङ्घर्षजननस्तथा ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
यश्च शास्त्रमनुध्याय़ेदृषिभिः परिपालितम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं निय़तेन्द्रिय़ः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यश्च श्राद्धे कुरुते सङ्गतानि; न देवय़ानेन पथा स याति |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च सञ्जय़ दुर्वुद्धिरव्रवीत्समितौ मुहुः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च सर्वमय़ो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च सर्वान्वशे चक्रे लोकपालान्धनुर्धरः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूय़ं स विन्दति ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
यश्च सेन्द्रानिमाँल्लोकानिच्छन्कुर्याद्वशे वली |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
यश्चतुर्गुणसम्पन्नं धर्मं वेद स धर्मवित् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वाय़ुर्धारय़ते जलम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
यश्चनोक्तो हि निर्देशः स्त्रिय़ा मैथुनतृप्तय़े |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
यश्चाग्नीनपविध्येत तथैव व्रह्मविक्रय़ी |
८ क