chevron_left  यत्सुवर्णंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
यत्सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः ||
७९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्सेनाः समकम्पन्त यद्वीरानस्पृशद्भय़म् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
धृतराष्ट्र उवाच
यत्सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन वध्यते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
यत्सैन्यं वारय़ामास शरैः संनतपर्वभिः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
यत्स्कन्नमस्य तत्पूर्वं यदस्कन्नं तदुत्तरम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्स्त्रिय़ो हेमसम्पन्नाः पथि मत्ताः स्म शेरते ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
यत्स्म तां परुषाण्याहुः सभामानाय़्य द्रौपदीम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यत्स्यादहिंसासंय़ुक्तं स धर्म इति निश्चय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
यत्स्यादिष्ट्वा राजसूय़े फलं तु; यत्स्यादिष्ट्वा वहुना काञ्चनेन |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
यत्स्यादेवंविधं मित्रं तदात्मसममुच्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यत्स्याद्धारणसंय़ुक्तं स धर्म इति निश्चय़ः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यत्स्वय़ं कर्मणा किञ्चित्फलमाप्नोति पूरुषः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
यतय़ः शान्तिपरमा यतात्मानो मुमुक्षवः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
यतय़स्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नाराय़णं हरिम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
यतय़ो भिक्षवश्चात्र वभूवुः पर्यवस्थिताः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यतय़ो मोक्षधर्मज्ञा योगाः सुचरितव्रताः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
यतय़ो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यथर्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
यथर्तु सस्येषु ववर्ष वासवो; न धर्ममार्गाद्विचचाल कश्चन |
९० क
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
यथर्तुकालरम्याश्च वनराजीः सुपुष्पिताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
यथर्तुवर्षी पर्जन्यो वहुपुष्पफला द्रुमाः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यथर्तुवर्षी भगवान्न तथा पाकशासनः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये |
७० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मय़ा |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
यथा कक्षं दहत्यग्निः प्रवृद्धः सर्वतश्चरन् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
यथा कथञ्चित्ते राजन्सम्प्राप्ता उत्तरान्कुरून् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
यथा कर्कटकी गर्भमाधत्ते मृत्युमात्मनः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कर्णस्य च रथो धार्तराष्ट्रस्य चोभय़ोः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यथा कर्म कृतं लोके तथा तदुपपद्यते ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कर्म शुभं कृत्वा स्वर्गोपगमनं ध्रुवम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यथा कर्मसमादिष्टं काममन्युसमावृतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
यथा कश्चिद्वनं घोरं वहुसर्पसरीसृपम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यथा काकश्च गृध्रश्च तथैवोपधिजीविनः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
यथा कार्त्स्न्येन वार्ष्णेय़ क्षत्रं स्वर्गमवाप्नुय़ात् ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कालं भवान्वेत्ति हय़मेधस्य तत्त्वतः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कालोदय़े प्राप्ते सम्यक्तैः सन्दधामहे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेय़ातां महोदधौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेय़ातां महोदधौ |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुनः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा किरीटी सेनाभ्यः सर्वाभ्यो व्यतिरिच्यते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तय़ोः |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
यथा कुमारः सत्यो वै न पुण्यो न च पापकृत् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
यथा कुरूणां सैन्यानि वभञ्ज युधि पाण्डवः |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
यथा कूर्म इहाङ्गानि प्रसार्य विनिय़च्छति |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
यथा कूलानि चेमानि भित्त्वा नानीय़ते वशम् ||
६ ख