द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
यमात्कुवेराद्वरुणाद्रुद्रादिन्द्राच्च यन्मय़ा |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
यमान्तकसमः कोपे श्रिय़ा वैश्रवणोपमः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यमाभ्यां तांश्च संसक्तांस्तदन्तरमुपाद्रवत् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
यमाभ्यां ददृशे रूपं कालान्तकय़मोपमम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
यमाभ्यां भीमसेनाच्च भय़ं मे तात जाय़ते ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
यमाभ्यां युय़ुधानाद्वा ये चान्ये तव सैनिकाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यमाभ्यां वारितान्दृष्ट्वा शीघ्रास्त्रो द्रोणमभ्ययात् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
यमाभ्यां सह राजेन्द्र धौम्येन च महात्मना |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यमाभ्यामेव चागम्य गन्धर्वास्ते पराजिताः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
यमारभत्यनिन्द्यात्मा न सोऽर्थः परिसीदति ||
४२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
द्रौणिरु उवाच
यमावध्य भय़ं नास्ति शस्त्रव्याधिक्षुधाश्रय़म् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
यमावपि सुसङ्क्रुद्धः समासाद्य रणे तदा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यमाश्रिता लोकमिमं परं च; जय़न्ति सम्यक्पुरुषा नरेन्द्रम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
यमाश्रित्य नरा राजन्वर्तय़ेय़ुर्यथासुखम् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यमाश्रित्य महावाहुं द्विषत्सङ्घघ्नमच्युतम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यमाश्रित्य महावाहुं पाञ्चालाः कुरवस्तथा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
यमास्थितः सप्त जघान पूगा; न्दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
यमास्थितः स्थावरजङ्गमानि; विभावसुर्भावय़तेऽमितौजाः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
यमाह कृष्णो दाशार्हः स नः सेनापतिः क्षमः |
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
यमाह कृष्णो दाशार्हः सोऽस्तु नो वाहिनीपतिः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
यमाह भीष्मो द्रोणश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
यमाहुः कपिलं साङ्ख्याः परमर्षिं प्रजापतिम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यमाहुः प्रतीपं नाम ||
४५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातय़ः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
यमाहुः सर्वभूतानां प्रकृतेः प्रकृतिं ध्रुवम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यमाहुरक्षरं नित्यं तस्मै वागात्मने नमः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
यमाहुरजितं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
यमाहुरध्यर्धगुणं कृष्णात्पार्थाच्च संय़ुगे |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यमाहुर्भीष्म इति ||
५० ग
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
यमाहुर्वेदविद्वांसो वराहमजितं हरिम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यमाय़ प्राह भगवान्साध्यो नाराय़णोऽच्युतः ||
१६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
यमाय़ प्रेषय़ामास चेदिमुख्यान्विशेषतः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
यमिच्छेय़ुः स राजा स्याद्यं द्विष्युः स पराभवेत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यमुना गङ्गय़ा सार्धं सङ्गता लोकपावनी ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
यमुना चाक्षय़स्रोताः कृष्णश्चेह तपोरतः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेऽतिमानुषम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
यमुनातीरमासाद्य संवत्सरमथापरम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यमुनाप्रभवं गत्वा उपस्पृश्य च यामुने |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
यमुपाश्रित्य सङ्ग्रामे कृतः शस्त्रसमुद्यमः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
यमुपासन्त राजानः सभाय़ामृषिभिः सह |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यमे च निय़मे चैव द्वेषे कामे परिग्रहे |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
यमेतेऽभ्यनुजानीय़ुः स धर्म इति निश्चय़ः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यमेन वापि सङ्ग्रामे को हास्तिनपुरं व्रजेत् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
यमेनमभिनन्देय़ुरमित्राः पुरुषं कृशम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यमेवंलक्षणं विद्यात्तममित्रं विनिर्दिशेत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
यमेषु चैवात्मगतेषु न व्यथे; त्स्वशास्त्रसूत्राहुतिमन्त्रविक्रमः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
यमो यथा धर्मविनिश्चय़ज्ञः; कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
यमो राजा वैश्रवणः कुवेरो; गन्धर्वय़क्षाप्सरसश्च शुभ्राः |
१४ ख