अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
यस्मात्पदाहनः क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम् |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
यस्मात्परस्परं घ्नन्तो ज्ञातय़ः कुरुपाण्डवाः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामपि |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यस्मात्पितामहो जज्ञे प्रभुरेकः प्रजापतिः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
यस्मात्पूर्वतरे काले पूर्वमेषावृता सुरैः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
यस्मात्पूर्वैः कृतं व्रह्म व्रह्मर्षिभिरनुष्ठितम् |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
यस्मात्प्राय़ोपविष्टस्य प्राहार्षीत्संशितात्मनः ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्प्रिय़तरो नास्ति ममान्यः पुरुषो भुवि |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
यस्मात्संशय़ितेऽर्थेऽस्मिन्यथान्याय़ं प्रवर्तसे |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यस्मात्सर्वं प्रभवति जगत्स्थावरजङ्गमम् |
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्मात्सर्वमनुष्येषु ज्याय़ांसं मामिहाव्रवीः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राक्षस उवाच
यस्मात्सर्वास्ववस्थासु धर्ममेवान्ववेक्षसे |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मात्सा भरतश्रेष्ठ द्वेषान्नष्टा सरस्वती |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
यस्मादगाधादव्यक्तादुत्तीर्णस्त्वं सनातनात् |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
यस्मादत्र समग्रास्ताः पतन्ति जलमूर्तय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यस्माददान्तान्दमय़त्यशिष्टान्दण्डय़त्यपि |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यस्माददुष्टमन्नं दूषय़सि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति |
१३४ घ
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
व्यास उवाच
यस्मादनादृत्य कृतं त्वय़ास्मान्कर्म दारुणम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
यस्मादभावी भावी वा भवेदर्थो नरं प्रति |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मादभावी भावी वा मनुष्यः सुखदुःखय़ोः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नराधिपः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
यस्मादसदृशः शापः प्रय़ुक्तोऽय़ं त्वय़ा मय़ि |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
यस्मादसि च मा वोचः स्वय़मभ्येत्य शोभने |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
यस्मादाप्याय़ते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
शक्र उवाच
यस्मादिमं लोकपथं प्रजाना; मन्वागमं पदवादे गजस्य |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
यस्मादुत्तार्यते पापाद्यस्मान्निःश्रेय़सोऽश्नुते |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
यस्मादुद्विजते लोकः कथं तस्य भवो भवेत् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद्वेश्मगतादिव |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यस्मादुद्विजते लोकः सर्वो मृत्युमुखादिव |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यस्मादुद्विजते विद्वन्सर्वलोको वृकादिव |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
यस्मादूर्ध्वगमेतत्तु तमसश्चैव भेषजम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
यस्मादेतन्निय़तं सत्सु नित्यं; तस्मात्सन्तो रक्षितारो भवन्ति ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यस्माद्ग्रसति चैवाय़ुर्हिंसकानां महाद्युते |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
यस्माद्द्विषसि गोविन्दं पाण्डवं च धनञ्जय़म् |
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यस्माद्धनस्योपपत्तिरेकान्तेन न विद्यते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
शुक उवाच
यस्माद्धर्मात्परो धर्मो विद्यते नेह कश्चन |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
यस्माद्धिरण्मय़ं सर्वं हिरण्यं तेन चोच्यते ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यस्माद्भवान्केदारखण्डमवदार्योत्थितस्तस्माद्भवानुद्दालक एव नाम्ना भविष्यतीति ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
यस्माद्भीतः प्राञ्जलिस्त्वं महर्षि; मागच्छेथाः शरणं दानवघ्न ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्माद्भय़ममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
यस्माद्यदभिजाय़ेत तत्तत्रैव प्रलीय़ते |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
यस्माद्युध्यन्तमाचार्यं धर्मकञ्चुकमास्थितः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
व्रह्मो उवाच
यस्माद्राक्षसय़ोनौ ते जातस्यामित्रकर्शन |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
यस्माद्राजन्नराः सर्वे अपत्यफलभागिनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
यस्मान्न पुनरावृत्तिमाप्नुवन्ति मनीषिणः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किञ्चित्कथञ्चन |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किञ्चित्कथञ्चन |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः |
१५ क