अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
यच्चाप्यवाप्यमन्यत्ते सर्वं प्रव्रूहि माचिरम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
यच्चाप्यशक्यतां तेषामाहतुः पुरुषर्षभौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
यच्चाभिभूः साधकं व्यापकं च; यन्मन्त्रवच्छंस्यते चैव लोके |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यच्चाभिलषितं दद्यात्तृषिताय़ाभिय़ाचते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
यच्चाभीप्सथ तत्सर्वं सम्भविष्यति वस्तथा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
यच्चावसं जाह्नवीतीरनित्यः; शतं समास्तप्यमानस्तपोऽहम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि; विहारशय़्यासनभोजनेषु |
४२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चाश्रुपातकलिलं वदनं वहसे नृप |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
यच्चाश्वस्तास्तवेच्छामः शर्म पार्थ तदस्तु ते |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
यच्चासहाय़तां राजन्नुक्तवानसि भारत |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
यच्चास्माकं कौरवैर्भूतपूर्वं; या नो वृत्तिर्धार्तराष्ट्रे तदासीत् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यच्चास्य कार्यं वृजिनमार्जवेनैव धार्यते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
युधिष्ठिर उवाच
यच्चास्य तेजः सुमहद्यच्च कर्म पुरातनम् |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
यच्चास्य राज्ञो विदितं हृदिस्थं भवतोऽनघ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यच्चास्य वाणं विकृतं धनूंषि च विशां पते |
१२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्चाहं पाण्डुपुत्रेण गुणवत्सु महात्मसु |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्चाहं वासुदेवस्य वाक्यं नाश्रौषमर्थवत् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत्सम्प्रष्टुमिहार्हथ ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
यच्चित्तस्तन्मना भूत्वा गुह्यमेतत्सनातनम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यच्चेतरैर्महाय़ज्ञैर्वेद तद्भगवान्स्वतः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
यच्चेतिहासेषु महत्सु दृष्टं; यच्चार्थशास्त्रे नृप शिष्टजुष्टे |
१०४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चेह किञ्चित्कर्तव्यं तत्सर्वं प्रापितं मय़ा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यच्चैतत्परमं व्रह्म यच्च तत्परमं पदम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
यच्चैव तस्मिन्नगरे श्रूय़ते महदद्भुतम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यच्चैव द्रौपदी कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चैवं मन्यसे मूढ न मे कश्चिद्व्यतिक्रमः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चैषां द्रविणं किञ्चिद्या चैषा ये च पाण्डवाः |
३७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छक्नोषि समुद्यन्तुं प्रय़ोक्तुमपि वा रणे |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
यच्छन्ति सचिवा गुह्यं मिथो विद्रावय़न्त्यपि ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्छरीरैरुपस्तीर्णां नरवारणवाजिनाम् |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छल्यं पतितं भूमौ नाहनद्वलिनं वली ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यच्छिक्षय़ानुद्धतः सन्रणे चरति सात्यकिः |
१५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीष्ममभ्ययुः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यच्छिखण्ड्यवधीद्भीष्मं पाल्यमानः किरीटिना ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
यच्छिवं नित्यमभय़ं नित्यं चाक्षरमव्ययम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
यच्छीलो यत्स्वभावश्च यद्वलो यत्पराक्रमः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
यच्छेद्वाङ्मनसी नित्यमिन्द्रिय़ाणां च विभ्रमम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
यच्छेद्वाङ्मनसी वुद्ध्या तां यच्छेज्ज्ञानचक्षुषा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
यच्छेद्वाङ्मनसी वुद्ध्या य इच्छेज्ज्ञानमुत्तमम् |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यच्छोभार्थं वलार्थं वा वित्तमस्ति तवानघ |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
ऋषय़ ऊचुः
यच्छ्रुतं यच्च दृष्टं नस्तत्प्रवक्ष्यामहे हरे ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
यच्छ्रुतं यच्च वो दृष्टं दिवि वा यदि वा भुवि |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
यच्छ्रुत्वा नरसिंहानां दैन्यहर्षातिविस्मय़ात् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छ्रुत्वा निहतान्पुत्रान्दीर्यते न सहस्रधा ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं कर्णं न दीर्यते ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
यच्छ्रुत्वा पूतमात्मानं विजानामि तपोधन |
२ क