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वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते |
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
यथा हि यात्वा सङ्ग्रामे न जीय़े विजय़ामि च |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि रश्मय़ोऽश्वस्य द्विरदस्याङ्कुशो यथा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
यथा हि राज्ञो वहवो ह्यमात्याः; पृथक्प्रमानं प्रवदन्ति युक्ताः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
यथा हि लक्ष्म चन्द्रे वै समुद्रे च यथा जलम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि लक्ष्यं निहतं धनुश्च; सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यथा हि लोहनिष्यन्दो निषिक्तो विम्वविग्रहम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराभवत् ||
९३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
यथा हि वैद्यः कुशलो ज्ञात्वा व्याधिं यथाविधि |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च सञ्जय़ |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
यथा हि शिशिरापाय़े दहेत्कक्षं हुताशनः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
यथा हि शिष्यः शास्तारं श्रुत्यर्थमभिधावति |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यथा हि शून्यां पथिकः सभामध्यावसेत्पथि |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
यथा हि शैशिरः कालो गवां मर्माणि कृन्तति |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
यथा हि समरे द्रौणिः पार्षतं वीक्ष्य मारिष |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिन्दम |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
यथा हि सुकृते क्षेत्रे फलं विन्दति मानवः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि सुमहानग्निः कक्षं दहति सानिलः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
यथा हि सुमहानग्निः कक्षे चरति सानिलः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
यथा हिमवतः पार्श्वं पृष्ठं चन्द्रमसो यथा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधय़ेत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
यथा हीनं नभोऽर्केण भूः शैलैः खं च वाय़ुना |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
यथा हीमानि लिङ्गानि दृश्यन्ते शिनिपुङ्गव ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
यथा हुतमनग्नौ च तथैव स्यान्निराकृतौ ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
यथा ह्यकर्णधारा नौ रथश्चासारथिर्यथा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
यथा ह्यकस्माद्भवति भूमौ पांसुतृणोलपम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
यथा ह्यग्निर्यथा वाय़ुर्यथा भूमिर्यथा जलम् |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा ह्यग्निर्यथा वाय़ुर्यथापः पृथिवी यथा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
यथा ह्यनुदय़े राजन्भूतानि शशिसूर्ययोः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
यथा ह्यनेत्रः शकटः पथि क्षेत्रं यथोषरम् ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यथा ह्यभ्यधिकं कर्णं गुणैस्तात धनञ्जय़ात् |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
यथा ह्यभ्युदितः सूर्यः प्रतपन्स्वेन तेजसा |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यथा ह्यमित्रवत्सर्वं त्वमस्मासु प्रवर्तसे ||
९५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
यथा ह्यमृतमादाय़ सोमो विष्यन्दते पुनः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
यथा ह्यमृतमाश्रित्य वर्तय़न्ति दिवौकसः |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
यथा ह्यस्येदृशी निष्ठा कृते कार्येऽपि दुष्करे ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा ह्याहवनीय़ोऽग्निर्गार्हपत्यात्प्रणीय़ते |
६५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
यथा ह्युच्चावचैर्वाक्यैः क्षिप्तचित्तो निय़म्यते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
यथा ह्युपस्थितैश्वर्याः पूजय़न्ते नरा नरान् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यात्मानुसारिणी |
५ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकामं च गच्छेय़मागच्छेय़ं तथैव च |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
यथाकामं प्रय़ात्येष यज्ञिय़श्च तुरङ्गमः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
यथाकामं यथाजोषं तय़ा रेमे सुमध्यया ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकामं यथाय़ोगं गच्छ वान्यत्र तिष्ठ वा ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालमरिन्दम |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
यथाकाममुपादाय़ समुत्तस्थुर्मुदान्विताः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
मतङ्ग उवाच
यथाकामविहारी स्यां कामरूपी विहङ्गमः |
१३ क