वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात्फलागमे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
येषु वृत्तिभय़ं नास्ति परलोकभय़ं न च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
येषु सन्तर्पय़ामास पूर्वान्क्षत्रिय़शोणितैः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
येषु सम्प्रतितिष्ठेय़ुः कुरवः पीडिताः परैः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
येषु स्नातो नरव्याघ्र न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् |
१३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
येष्वलोभस्तथामोहो ये च सत्यार्जवे रताः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत्फलं प्राप्यतेऽनघ |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
येष्वहःसु तव व्रह्मन्सलिलेच्छा भविष्यति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
येष्वानृशंस्यं सत्यं चाप्यहिंसा तप आर्जवम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
येष्वेवैते सप्त गुणा भवन्ति; सम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
येऽत्रानाथा जनस्यास्य सनाथा ये च भारत |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
येऽधिगच्छन्ति तत्सन्तस्तेषां नास्ति भय़ं पुनः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
येऽधीय़न्ते सेतिहासं पुराणं; मध्वाहुत्या जुह्वति च द्विजेभ्यः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
येऽनृतं कथय़न्ति स्म ते वै निरय़गामिनः ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
येऽन्तरं यान्ति कार्येषु ते वै निरय़गामिनः ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
येऽन्याय़ेन जिहीर्षन्तो जना इच्छन्ति कर्हिचित् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
येऽन्याय़ेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कर्हिचित् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
येऽन्ये कामास्तव राजन्हृदिस्था; दास्यामि तांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
येऽन्ये केचिन्मनुष्येषु तिर्यग्योनिगता अपि |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
येऽन्ये वैहारिकास्ते तु मानुषाणामिति स्मृताः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
येऽन्ये स्वस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
येऽपश्यन्सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
येऽपि तत्रापिवन्क्षीरं घृतं दधि च मानवाः |
७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
येऽपि राजर्षय़ः सर्वे ते चापि समुपस्थिताः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
येऽपि सङ्कीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
येऽपि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिका वेदनिन्दकाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धय़ान्विताः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
येऽभिगच्छन्ति सततं गङ्गामभिगतां सुरैः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
येऽमी तु प्रचलितधर्मकामवृत्ताः; क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रय़ोगाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
येऽरक्ष्यमाणा हीय़न्ते दैवेनोपहते नृपे |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
येऽर्थं सन्ततमासाद्य दीना इव समासते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
येऽर्थाः स्त्रीषु समासक्ताः प्रथमोत्पतितेषु च |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
येऽविषह्या ह्यसम्भोज्या निकृत्या पतनं गताः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
येऽशृण्वन्कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
येऽस्मान्पुरोऽपनृत्यन्त पुनर्गौरिति गौरिति |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
येऽस्मिँल्लोके विजय़न्तीह कामा; न्व्राह्मीं स्थितिमनुतितिक्षमाणाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
धृतराष्ट्र उवाच
येऽस्मिन्धर्मान्नाचरन्तीह के चि; त्तथा धर्मान्केचिदिहाचरन्ति |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
येऽय़ुध्यन्त महाराज क्षत्रिय़ा हतवान्धवाः ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
येय़ं कुमारी सुश्रोणी भगिनी ते यवीय़सी |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
येय़ं भर्तारमस्माकमवमन्येह जीवति ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
येय़ं मत्परिषत्कृत्स्ना जेतुमिच्छसि तामपि ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
युधिष्ठिर उवाच
येय़मर्थोद्भवा तृष्णा कथमेतां पितामह |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
यैः कैश्चित्संमतो लोके गुणैः स्यात्पुरुषो नृषु |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
यैः कैश्चित्संमतो लोके गुणैस्तु पुरुषो नृषु |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
यैरन्तरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृतम् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
यैरर्द्यमानाः सुभृशं तपस्तप्यन्ति मानवाः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
यैरहं शक्नुय़ां योद्धुमपि वज्रधरान्वहून् ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
यैरात्मभूतैर्भगवान्पार्वत्या च महेश्वरः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
यैराविष्टा घृणां त्यक्त्वा योत्स्यन्ते तव वैरिभिः ||
११ ख