आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
यद्युक्तमनुरूपं च जरत्कारुस्तपोधनः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
यद्युगान्ते पशुपतिः सर्वभूतानि संहरन् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीं रुचिं पश्येत मे गुरुः |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
यद्युत्तरोऽय़ं सङ्ग्रामे विजेष्यति महारथान् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
यद्युत्पतसि लोकांस्त्रीन्यद्याविशसि भूतलम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रूञ्जय़ेत वा ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
यद्युष्माकं वर्ततेऽसौ न धर्म्य; मद्रुग्धेषु द्रुग्धवत्तन्न साधु |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
यद्यूष्मभाव आग्नेय़ो वह्निना पच्यते यदि |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येकरात्रं वस्तव्यं त्वय़ा सह मय़ेति ह ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत्स्यात्कुरुनन्दन |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
यद्येतत्संविजानासि यदि सम्यग्व्रवीम्यहम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
शृङ्ग्यु उवाच
यद्येतत्साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतदपसव्यं ते भविष्यति वचो मम ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
दम्भोद्भव उवाच
यद्येतदस्त्रमस्मासु युक्तं तापस मन्यसे |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतदहमज्ञास्यं वनवासो हि वो ध्रुवम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यद्येतदुत्सहसे ततो नय़स्वैनमिति ||
१५ 7
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यद्येतदेवं कृत्वापि न विमोक्षोऽस्ति कस्यचित् |
५९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
यद्येतदेवं जानासि न च मामतिशङ्कसे |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
शकुन्तलो उवाच
यद्येतदेवं दुःषन्त अस्तु मे सङ्गमस्त्वय़ा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
यद्येतदेवं न करोषि कामं; ममेप्सितं देवराजेह सर्वम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
यद्येतदेवं शर्मिष्ठे न मन्युर्विद्यते मम |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यद्येतदेवं सङ्ग्रामे न कुर्यां पुरुषर्षभाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते; सम्प्रीय़माणः पाण्डवैरेकराज्यम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतदेवमुक्त्वा तु न कुर्यां पृथिवीश्वराः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
यद्येतद्रोचते राजन्पुनर्व्रूहि व्रवीमि ते ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतद्वो वहुमतं मन्यध्वं वा क्षमं यदि |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिन्दम |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतमूरुं गदय़ा न भिन्द्यां ते महाहवे ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
यद्येतैस्त्वं मुच्यसेऽरिष्टदेहः; पुनर्जन्म प्राप्स्यसे जीव एव ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
यद्येनं धारय़स्येकं सफलं ते विकत्थितम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
यद्येनमपि मातस्त्वं मामिवाण्डविभेदनात् |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
यद्येव तैः कृतं किञ्चिद्व्यलीकं वा सुतैर्मम |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येव देवी पृथिवीं प्रविष्टा; दिवं प्रपन्नाप्यथ वा समुद्रम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
यद्येव प्रतिषेद्धव्यो यद्युपेक्षणमर्हति |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
यद्येव राज्ञो वरुणस्य पत्नी; यमस्य सोमस्य धनेश्वरस्य ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येवं त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वचः शुभम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येवं पाण्डवै राजन्भवद्विषय़वासिभिः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
यद्येवं मन्यसे राजंस्त्रिधा धर्मविचारणा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
यद्येवं वक्ष्यसे भूय़ो मामप्रिय़मिह द्विज |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
राजो उवाच
यद्येवमफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
यद्येवमभिजानामि का व्यथा मे विजानतः ||
८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
यद्येवमभिय़ाय़ाच्च दुर्वलं वलवान्नृपः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
यद्येवमहमज्ञास्यमशक्तान्रक्षणे मम |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
यद्येवमिह कर्तव्यं वसाम्यहमसंशय़म् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१२८
धर्म उवाच
यद्येवमीप्सितं राजन्भुङ्क्ष्वास्य सहितः फलम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
कुन्त्यु उवाच
यद्येवैष्यति साय़ाह्ने यदि प्रातरथो निशि |
३ क