विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
यत्ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणावुभौ ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि प्रभवाप्ययम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
यत्ते वनेऽस्मिन्नृपते दृष्टं दिव्यं निदर्शनम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
युधिष्ठिर उवाच
यत्ते वाक्यं धृतराष्ट्रानुशिष्टं; गावल्गणे व्रूहि तत्सूतपुत्र ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
यत्ते व्यवसितं वीर अस्माकं सुमहत्प्रिय़म् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
शर्मिष्ठो उवाच
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
यत्ते सहस्रसमिता ननृतुर्देवय़ोषितः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
यत्तेन किञ्चिद्धि कृतं हि कर्म; तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
यत्तेनोक्तं दुरुक्तं तत्तदानीं; हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
यत्तेषां च प्रिय़ं तत्ते वक्ष्यामि द्विजसत्तम |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
यत्तेऽभिलषितं चान्यत्तदवाप्नुहि संय़ुगे ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
यत्तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तेऽभिलषितं राजन्सर्वमेतदवाप्स्यसि |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
यत्तेऽहं प्रीय़माणाय़ वक्ष्यामि हितकाम्यया ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
यत्तेऽहमधमाचार दुहित्रर्थेऽस्मि वञ्चितः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
यत्तो दृढश्च दक्षश्च धृतिमानर्जुनः सदा |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
यत्तो भवेथाः सङ्ग्रामे स्पर्धत्येष मय़ा सदा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
यत्तो भीष्मविनाशाय़ प्रय़यौ भरतर्षभ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
यत्तोऽभवत्परित्रस्तस्तक्षकात्पन्नगोत्तमात् ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्य नाशने |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
यत्त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानिह ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
यत्त्वं गतः प्रहितो जातवेदो; वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
यत्त्वं दित्ससि कृष्णाय़ राजन्नतिथय़े वहु |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वं दुरोदरो भूत्वा पाण्डवानवमन्यसे |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
यत्त्वं नार्हसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजसः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वं निदर्शनार्थं मां शल्य जल्पितवानसि |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
यत्त्वं पितरि भीष्मे च प्रणिपातं समाचरेः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
यत्त्वं प्रशान्तिमिच्छेथाः पाण्डुपुत्रैर्महात्मभिः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वं मामभिसन्धत्से त्वां चाहं शिनिपुङ्गव |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
यत्त्वं मे हृदय़ाज्जातो वय़ः स्वं न प्रय़च्छसि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
यत्त्वं मे हृदय़ाज्जातो वय़ः स्वं न प्रय़च्छसि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
यत्त्वं मे हृदय़ाज्जातो वय़ः स्वं न प्रय़च्छसि |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
यत्त्वं मे हृदय़ाज्जातो वय़ः स्वं न प्रय़च्छसि |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्त्वत्कृतेऽय़ं पतितः पतिस्ते निहतो रणे ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
यत्त्वत्र विहितं कार्यं नैष तद्वेत्ति माधव |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
यत्त्वद्य मे व्यवसितं तच्छृणुध्वं नरर्षभाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्त्वमस्मद्धितं कर्म चकर्थ परमाद्भुतम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वमात्मानमस्मांश्च प्रशंस्यान्न प्रशंससि |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
यत्त्वमेवङ्गते व्रूय़ाः पश्चिमे वय़सि स्थितः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
यत्त्वमेवङ्गतो वज्रिन्यद्वाप्येवङ्गता वय़म् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यत्त्वमेवङ्गतो वज्रिन्यद्वाप्येवङ्गता वय़म् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्त्वस्मदाश्रय़ं किञ्चिद्दत्तमिष्टं च सञ्जय़ |
५० क
वन पर्व
अध्याय
३९
महेश्वर उवाच
यत्त्वस्य काङ्क्षितं सर्वं तत्करिष्येऽहमद्य वै ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
यत्त्वस्य प्रिय़मातिथ्यं मानार्हस्य महात्मनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यत्त्वस्य सहजं राजन्पितृपैतामहं वलम् |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
यत्त्वामुपधिना राजन्द्यूतेनावञ्चय़त्तदा |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
यत्त्वेतत्पश्यसि व्रह्मन्मूलमस्यार्धभक्षितम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यत्त्वेव राज्ञो ज्याय़ो वै कार्याणां तद्वदामि ते |
१६ क