अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
यथा च भगवान्दृष्टो मय़ा पूर्वं समाधिना ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
यथा च भरतो राजा दौःषन्तिः पृथिवीपतिः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च भाषन्ति परस्परं ते; छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदतः शृणु |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
यथा च भूरिश्रवसो यत्र ते संशय़ो नृप ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
यथा च मम राज्ञश्च तथा दुर्योधनस्य ते |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
यथा च मृन्मय़ं भाण्डं चक्रारूढं विपद्यते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च युद्धमभवत्पृथिवीक्षय़कारकम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
यथा च रामो राजेन्द्र मय़ा पूर्वं प्रसादितः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भृगुरु उवाच
यथा च रोचते तुभ्यं तथा कर्तास्म्यहं मुने ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यथा च वः स्युः पतय़ोऽनुकूला; स्तथा वृत्तिमात्मनः स्थापय़ध्वम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यथा च वर्तन्पुरुषः श्रेय़सा सम्प्रय़ुज्यते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
यथा च वृत्रहा सर्वान्सपत्नान्निर्दहत्पुरा |
१११ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च वेणुः कदली नलो वा; फलन्त्यभावाय़ न भूतय़ेऽऽत्मनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यथा च वेदप्रामाण्यं त्यागश्च सफलो यथा |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च वेदान्सावित्री याज्ञसेनी तथा सती |
४ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
यथा च वो न जानीय़ाच्चरतो भीमशासनात् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
यथा च व्रह्मणा वद्धं सङ्ग्रामे तारकामय़े |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
यथा च शकुनाः सूक्ष्माः प्राप्य जालमरिन्दम |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
यथा च शूद्रो व्राह्मण्यां जन्तुं वाह्यं प्रसूय़ते |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च सञ्जय़ो राज्ञा मन्त्रं रहसि श्रावितः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
यथा च सम्प्रवर्तन्ते यस्मिंस्तिष्ठन्ति वा विभो |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
यथा च सलिले राजन्क्रीडार्थमनुसञ्चरन् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यथा च स्वगृहस्थः श्वा व्याघ्रं वनगतं भषेत् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
यथा चतुर्षु वर्णेषु द्वय़ोरात्मास्य जाय़ते |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
यथा चन्द्रमसो लक्ष्म सर्वथा नापकृष्यते |
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जाय़ते |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
यथा चन्द्रश्च रोहिण्यां यथा धूमोर्णय़ा यमः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
यथा चन्द्रार्कसंय़ुक्तं तमस्तदुपलभ्यते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
यथा चन्द्रो ह्यमावास्यां नक्षत्रैर्युज्यते गतः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
यथा चन्द्रो ह्यमावास्यामलिङ्गत्वान्न दृश्यते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चन्द्रोदय़े राजन्वर्धमानो महोदधिः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
यथा चन्द्रोदय़ोद्धूतः क्षुभितः सागरो भवेत् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
यथा चाक्षय़्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
यथा चात्मनि कल्याणं सम्भावय़सि पाण्डव |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चानाथवत्किञ्चिच्छरीरं न विनश्यति ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
यथा चानिमिषाः स्थूला जालं छित्त्वा पुनर्जलम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चाभ्यनुजानीय़ाद्गच्छन्तं मां महीपतिः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
यथा चार्थपतिः कृत्यं पश्यते न तथेतरः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चार्धं शरीरस्य ममेदं काञ्चनीकृतम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
यथा चाल्पेन माल्येन वासितं तिलसर्षपम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चाशिष्टवन्मन्दो रोषादसकृदुत्थितः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चास्त्राण्यवाप्तानि यथा चाराधितश्च ते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
यथा चाहं नातिचरे कथं चि; त्पतीन्महार्हान्मनसापि जातु |
२० क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु वान्धवान् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चाय़ुर्ध्रुवं सत्ये त्वय़ि धर्मस्तथा ध्रुवः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
यथा चेक्ष्वाकुरचरत्सपुत्रजनवान्धवः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
५१
जनमेजय़ उवाच
यथा चेदं कर्म समाप्यते मे; यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् |
४ क