भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वय़ा कथितं पूर्वं न योत्स्यामीति केशव ||
६६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
यत्त्वय़ा कथितं पूर्वं मामनासाद्य किञ्चन |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्त्वय़ा कथितं वाक्यं श्रुतं सञ्जय़ तन्मय़ा |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वय़ा कथितं वीर पुरा राज्ञां समागमे |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यत्त्वय़ा कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यत्त्वय़ा प्राप्तमद्येह एकान्तगतवुद्धिना ||
९६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
यत्त्वय़ा मर्षितं पूर्वं तदशक्तेन मर्षितम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्त्वय़ा सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपराय़ण |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
यत्त्वय़ा सलिलं पीतं तदस्मिन्पुनरुत्सृज ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
यत्त्वय़ोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
यत्त्वय़ोक्तं नरव्याघ्र मत्समक्षं महाद्युते |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
यत्त्वय़ोक्तं वचस्तेन मोहोऽय़ं विगतो मम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्त्वय़ोक्तो महावाहुरस्त्रार्थं पाण्डवर्षभ ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
यत्नं करोति विपुलं हन्याच्चैनमसंशय़म् ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा स्वस्त्यावय़ोर्भवेत् ||
९७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्नं चाप्यकरोद्राजन्मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्चैव भारत ||
१३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
यत्नतोऽन्वेषमाणास्तु नैवापश्यञ्जनाधिपम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्नवानपि तु श्रीमाँल्लाङ्गूलोद्धरणोद्धुतः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यत्नवान्भव राजेन्द्र यत्नवान्सुखमेधते ||
१३८ ग
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद्देववच्च ह |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
यत्नान्निय़च्छतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षय़ा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
यत्नेन च कृतं यत्ते दैवेन विनिपातितम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्नेन तु स तं हर्षं संनिगृह्य परन्तपः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
यत्नेन तु सदा पार्थ योद्धव्यो धृतराष्ट्रजः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुध्यते ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
यत्नेन महता राजन्पर्यवस्थापय़द्वली ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
यत्नेन महता वीरौ वारय़ामासतुस्ततः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
जैगीषव्य उवाच
यत्नेनाल्पेन वलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
यत्नो हि सततं कार्यः कृतो दैवेन सिध्यति |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
यत्पवित्रं पवित्राणां तद्घृतं शिरसा वहेत् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्पापं यन्न कल्याणं सर्वं तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्पापो निहतः सङ्ख्ये कौरव्यो धृतराष्ट्रजः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
यत्पार्थेन प्रतिज्ञातं तत्तथा न तदन्यथा |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
यत्पिङ्गलज्येन किरीटमाली; क्रुद्धो रिपूनाजगवेन हन्ति ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यत्पित्र्याद्भ्रंशिता राज्यात्त्वय़ेहामिषगृद्धिना ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
यत्पिवन्ति जलं तत्र स्नाय़न्ते विश्रमन्ति च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
यत्पुंसां परदारेषु तच्चैनां चारय़ेद्व्रतम् ||
५८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
यत्पुत्रवशमागच्छेः सत्त्वज्ञः सव्यसाचिनः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
यत्पुत्रांस्तेऽवधीत्सङ्ख्ये द्रोणं चैव न्ययोधय़त् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
यत्पुत्रान्सगरस्यैषा भस्माख्याननय़द्दिवम् ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्पुनर्द्रविणं किञ्चित्तत्राजीय़न्त पाण्डवाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
यत्पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतेति ह |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यत्पुनर्युद्धकाले त्वं पुत्रान्गर्हय़से नृप |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
यत्पुरं दुर्गसम्पन्नं धान्याय़ुधसमन्वितम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यत्पुरा कथितं वीर त्वय़ा राज्ञां समागमे |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
यत्पुरा तत्पुनस्त्वत्तो वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
यत्पुरा न निगृह्णीषे वार्यमाणो महात्मभिः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
यत्पूज्यः पूजय़सि नो द्रष्टव्यो द्रष्टुमिच्छसि ||
४६ ख