द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
युवानमिन्दीवरदामवर्णं; चेदिप्रिय़ं युवराजं प्रहस्य |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
युवानमिन्द्रिय़ोपेतं शतेन सह यूथपम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
युवानौ च महेष्वासौ यमौ माद्रवतीसुतौ |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
युवाभ्यां सहितो वीरः किं न कुर्यान्महाय़शाः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
युवामुभौ कालवशौ यदि वै मृत्युपन्नगौ |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
युवेव चास्मि संवृत्तस्त्वदनुध्यानवृंहितः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
युवेव समशोभत्स गोष्ठीमध्ये स्वलङ्कृतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
पितामह उवाच
युवय़ोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीय़ते ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
युवय़ोस्तां प्रवक्ष्यामि मम शोकविनाशिनीम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
युष्मत्कृतमिदं शास्त्रं प्रजापालो वसुस्ततः |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
युष्मत्तेजोविवृद्ध्यर्थं मय़ा ह्युद्धर्षणं कृतम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
युष्मदर्थे महाराज यदि मां वृणुषेऽनघ ||
९१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२५
मन्दपाल उवाच
युष्माकं च परं वीर्यं नाहं पूर्वमिहागतः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
युष्माकं च सदा देवाः शिवमेवं भविष्यति ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
मन्दपाल उवाच
युष्माकं परिरक्षार्थं विज्ञप्तो ज्वलनो मय़ा |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजैः ||
२७ ग
विराट पर्व
अध्याय
३२
विराट उवाच
युष्माकं विक्रमादद्य मुक्तोऽहं स्वस्तिमानिह |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
युष्माञ्शङ्के दीय़तां पुष्करं मे; न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
युष्मानाज्ञाय़ निर्यातो भीरूनकृतनिश्रमान् ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
युष्मानेते हि वक्ष्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मय़ाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
युष्मान्प्रधर्षय़िष्यन्ति विकृता मांसभोजनाः ||
९६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
युष्मान्सम्वोधय़ाम्येष यथा स न हरेद्वलात् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
युष्माभिः सहितैः सर्वैः शोकसन्तापविह्वलाः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
युष्माभिरिह पूर्णाभिरन्यांस्तत्र न वेतसम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
युष्माभिर्देवसङ्काशाः कृपा भवतु वो मय़ि ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युष्माभिर्नित्यसन्द्विष्टो दैवाच्चापि स्वभावतः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
युष्माभिर्निहतो युद्धे तदा धर्मः क्व वो गतः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
युष्माभिस्तानि चीर्णानि यान्यसाधूनि साधुषु |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
युष्मासु दृश्यते वृद्धिः सत्यमेतद्व्रवीमि वः ||
६५ ग
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
युष्मासु ध्रिय़माणेषु दुःखानि विविधान्युत |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
युष्मासु ध्रिय़माणेषु पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
युष्मासु पापमतिना अपापेष्वेव नित्यदा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुजेऽमितसौभाग्यः पौलोम्या मघवानिव ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
युय़ुत्सता महेन्द्रेण पुरा सार्धं महात्मना |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्समानाः कुरुभिः पाण्डवान्समहर्षय़न् ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्समानाः कुरुभिः प्रतीक्षन्तेऽस्य शासनम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्समानाः कौन्तेय़ान्नानाध्वजसमाकुलाः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सवः परान्सङ्ख्ये प्रतीय़ुः क्षत्रिय़र्षभाः ||
६२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सवः प्रविविशुर्जरासन्धेन भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
युय़ुत्सवश्चाप्रतीपा भवन्ति; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सवस्ते विक्रान्ता विजय़ाय़ महावलाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुं चैव कौरव्यं पाञ्चाल्यं चोत्तमौजसम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुं तव पुत्रं तु प्राद्रवन्तं महद्वलम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुं पाण्डवार्थाय़ यतमानं महारथम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
युय़ुत्सुं सञ्जय़ं चैव तथैवान्यान्सभासदः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
युय़ुत्सुरु उवाच
युय़ुत्सुं समनुज्ञाप्य प्रविवेश नृपक्षय़म् |
९२ ख