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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
योगमेकान्तशीलस्तु यथा युञ्जीत तच्छृणु ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
योगमेतद्धि योगानां मन्ये योगस्य लक्षणम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव भारत ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशय़म् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
योगसिद्धा जगत्सर्वमसक्तं विचरत्युत |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिताः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय़ |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
योगस्य कलय़ा तात न तुल्यं विद्यते फलम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
योगस्य तावदेतेभ्यः फलं प्रत्यक्षदर्शनम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
योगाचार्यो महावुद्धिर्दैत्यानामभवद्गुरुः |
४२ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
योगाचार्यो रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या; स्थानं प्राप स्वं महात्माप्रमेय़म् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
योगाच्छित्त्वादितो दोषान्पञ्चैतान्प्राप्नुवन्ति तत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
योगात्कृत्वा द्विधात्मानमाजगाम तताप च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
कुवेर उवाच
योगात्मकेनोशनसा रुद्ध्वा मम हृतं वसु |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
द्रोण उवाच
योगाद्दुःखोचितत्वाच्च तस्मात्त्वत्तोऽधिकोऽर्जुनः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
योगानां परमं ज्ञानं साङ्ख्यानां च विशेषतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
योगान्स सर्वानभिभूय़ मर्त्या; न्नाराय़णात्मा कुरुते महात्मा ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धय़े ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
योगिनः सुमहावीर्याः स्तुवन्ति त्वां महर्षय़ः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
१९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ||
२१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
योगिनां परमं व्रह्म व्यक्तं व्रह्मविदां निधिम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
योगिनामपि यो योगी कारणानां च कारणम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत्परम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
योगी निष्कृष्टमात्मानं तथा सम्पश्यते तनौ ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
योगी योगेन वह्निं च शमय़ामास वारिणा ||
२७ ग