अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
योगी योज्यो महावीजो महारेता महातपाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
युधिष्ठिर उवाच
योगी वलमवाप्नोति तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
योगीश्वराः सुवहवो योगदं पितरं गुरुम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
योगे वुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो व्रह्मणि धारय़न् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
योगे साङ्ख्ये च कुशलो राजानमिदमव्रवीत् ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
योगे साङ्ख्येऽपि च तथा विशेषांस्तत्र मे शृणु ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
योगेन केनचिद्राजन्नर्जुनस्त्वपनीय़ताम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
योगेन चैनां निर्योगः स्वय़ं निय़ुय़ुजे तदा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
योगेन महता युक्तस्तां माय़ां व्यपकर्षत ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
योगेन लोकान्विचरन्सुखं संन्यस्य चानघ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
योगेन वहुधात्मानं कृत्वा तिष्ठामि मूर्तिषु |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
कुवेर उवाच
योगेनात्मगतिं कृत्वा निःसृतश्च महातपाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपराय़णः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
योगेनात्मानमाविश्य संसिद्धिं परमां यय़ौ ||
२८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
योगेनानुप्रविश्येह गुरुपत्न्याः कलेवरम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शय़ात्मानमव्ययम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
योगेश्वर नमस्तेऽस्तु त्वं हि सर्वपराय़णम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव ||
१६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशय़ः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्र राजसु दर्शितम् ||
१४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
योगैः सम्पूज्यते नित्यं स एवाहं विभुः स्मृतः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
योगैरपि हता यैस्ते तान्मे शृणु धनञ्जय़ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
योगैश्वर्यमतिक्रान्तो योऽतिक्रामति मुच्यते ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
योगैश्वर्येण संय़ुक्ता धारय़न्ति प्रजा इमाः ||
७६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पानि कर्म च |
१३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
योगो योग इति क्रुद्धाः सारथींश्चाप्यचोदय़न् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
योगो योग इति प्रीत्या ततः शव्दो महानभूत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
योगो योगेति सहसा प्रादुरासीन्महास्वनः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
योग्यस्ताडय़ितुं क्रोधाद्भोजनार्थं वृकोदर ||
७५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
वैशम्पाय़न उवाच
योग्यां तेषां रूपतेजोय़शोभिः; पत्नीमृद्धां दृष्टवान्पार्थिवेन्द्रः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
योग्यो राजा भीमसेनो महात्मा; क्लीवस्य वा मम किं राज्यकृत्यम् ||
१०४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
योगय़ज्ञः प्रवृत्तो मे ज्ञानव्रह्ममनोद्भवः |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
योगय़ुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
योगय़ुक्तं महात्मानं यथा वाणं गुणच्युतम् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
योगय़ुक्ता दिवं याता तपःसिद्धा तपस्विनी ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
योगय़ुक्ता महात्मानः सततं व्राह्मणप्रिय़ाः |
७२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
योगय़ुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेय़ुषः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
योगय़ुक्तो मुनिर्व्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
योगय़ुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय़ः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
योजनं समतिक्रान्तो न स शक्यस्त्वय़ा पुनः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
योजनाद्ददृशे श्रीमानिन्द्राय़ुधसमप्रभः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
उष्ट्र उवाच
योजनानां शतं साग्रं या गच्छेच्चरितुं विभो ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
योजनानां शतान्यूर्ध्वं पञ्चोच्छ्रितमरिन्दम |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
योजनानां सहस्रं च शतं च भरतर्षभ |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
योजनानां सहस्राणि पञ्चाशन्माल्यवान्स्थितः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै ||
४० ख