शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यं त्विमं धर्ममित्याहुर्धनादेष प्रवर्तते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
यं ददासि वरं तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पितः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीय़ान्भविष्यति |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं दृगात्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
यं दृष्ट्वा पार्थिवाः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शय़ानं देवरूपिणम् |
७६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यं दृष्ट्वा प्रस्थितं साध्वी पृथाप्यनुय़यौ तदा |
२१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
यं दृष्ट्वा वै प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महता विभो ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
यं दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नान्यहेतुकम् ||
३४ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
ऋषिरु उवाच
यं दृष्ट्वाहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महतान्वितः ||
१०४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यं देवा मरुतो गर्भं पितुः पार्श्वादपाहरन् ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
यं द्वौ न जहतः शव्दौ जीवमानं कदाचन |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यं न पश्यन्ति चाराध्य देवा ह्यमितविक्रमम् |
१८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यं न व्रह्मादय़ो देवा विदुर्यं न महर्षय़ः |
१५१ क
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
यं नातितपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
यं निरीक्षेत सङ्क्रुद्ध आशय़ा पूर्वजातय़ा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
यं निशाम्य तदा कद्रूर्विनतामिदमव्रवीत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
यं पश्यन्ति महात्मानो धृतिमन्तो मनीषिणः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
यं पश्यन्ति व्राह्मणाः साधुवृत्ताः; क्षीणे पापे मनसा ये विशोकाः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यं पुंसां त्रिषु लोकेषु सर्वशूरममंस्महि |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय़्यजाय़िथाः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
यं पुरस्कृत्य सहिता युधि जेष्याम पाण्डवान् |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यं पुरा पर्यवीजन्त तालवृन्तैर्वरस्त्रिय़ः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
यं पुरा पर्युपासीना रमय़न्ति महीक्षितः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
यं पुरा व्यजनैरग्र्यैरुपवीजन्ति योषितः |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
यं पुरोधाय़ कुरव आह्वय़न्ति स्म पाण्डवान् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
यं पूजय़ेम सम्भूय़ यश्च नः परिपालय़ेत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं पृथग्धर्मचरणाः पृथग्धर्मफलैषिणः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यं प्रजा वव्रिरे पुण्यं गोप्तारं नृपसत्तम ||
९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
यं प्रतिव्यूह्य तिष्ठन्ति पाण्डवास्तव वाहिनीम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
यं प्रपश्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तम |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणाः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
यं प्रशंसन्ति वन्धक्यो न स जीवति मानवः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यं प्राप्य कृतकृत्याः स्म इत्यमन्यन्त वेधसः ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
यं प्राप्य सविता राजन्सत्येन प्रतितिष्ठति |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
यं भारं पुरुषो वोढुं मनसा हि व्यवस्यति |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यं भय़ेष्वभिगच्छन्ति सहस्राक्षमिवामराः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
यं मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं; तं मध्यस्थं भोजय़ेद्धव्यकव्ये ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रय़ोदशम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यं मन्येत ममाभावादस्याभावो भवेदिति |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यं मन्येत ममाभावादिममर्थागमः स्पृशेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
यं मानसं वै प्रवदन्ति पुत्रं; पितामहस्योत्तमवुद्धिय़ुक्तम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहय़िष्यसि |
७ क