द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च तन्महदाश्चर्यं सभाय़ां मम सञ्जय़ |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
यच्च तस्य हुतं किञ्चित्सर्वं तस्योपहन्यते ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यच्च तान्पाण्डवान्द्यूते विषमेण विजित्य ह |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यच्च ते तपसो वीर्यं यच्च क्षात्रं वलं तव |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिन्दम |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
यच्च ते द्रोणभीष्माभ्यां युद्धमासीदरिन्दम |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यच्च ते पाण्डवा राजंश्छलद्यूते पराजिताः ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
यच्च ते मत्परिज्ञाने कौतूहलमरिन्दम |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च ते मानसं वीर तीर्थय़ात्रामिमां प्रति |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
यच्च तेषु फलं धर्मे भूय़ो दान्ते तदुच्यते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भय़मर्जुनसम्भवम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९३
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च त्वं मन्यसे प्राप्तं तद्व्रूहि त्वं सुय़ोधन |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च त्वं मन्यसे मूढ भीष्मद्रोणकृपादय़ः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
यच्च त्वं वक्ष्यसे भीष्म पाण्डवाय़ानुपृच्छते |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
यच्च दुःखं त्वय़ा प्राप्तं द्यूते वै कृष्णय़ा सह |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च दुर्योधनेनेदं राज्यं भुक्तमकण्टकम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च दुर्योधनो मन्दः कृतवांस्तनय़ो मम |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च धारय़ते तीव्रं दुःखं पुत्रविनाशजम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यच्च नः प्रेक्षमाणानां कृष्णामानाय़यः सभाम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
यच्च नः सहितान्सर्वान्विराटनगरे तदा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च नाश्नाति मे भर्ता सर्वं तद्वर्जय़ाम्यहम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यच्च पित्रानुशिष्टोऽसि तद्वचः परिपालय़ |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
यच्च पूर्वे समाहारे यच्च पूर्वतरे परे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
यच्च पैतामहं स्थानं व्रह्मराशिसमुद्भवम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
यच्च प्रार्थय़ते तच्च मनसा प्रतिपद्यते ||
१२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यच्च प्रार्थय़से हन्तुं कृष्णौ मोहान्मृषैव तत् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च भक्त्या प्रपन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च भर्ता न पिवति यच्च भर्ता न खादति |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
यच्च भर्तानुय़ुञ्जीत तदेवाभ्यनुवर्तय़ेत् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
यच्च भाषन्ति ते तुष्टास्तत्तद्गृह्णामि मेधय़ा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
यच्च भूतं भविष्यच्च भवच्च परमद्युते |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यच्च भूतं भविष्यच्च भवच्च पुरुषर्षभ |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यच्च भूतं स भजते भूता ये च तदन्वय़ाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
यच्च भूय़ोऽस्ति तेजस्तत्परमं मम दर्शय़ ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च मा भाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यच्च मां धार्मिको भूत्वा व्रवीषि गुरुघातिनम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
९०
युधिष्ठिर उवाच
यच्च मां भगवानाह तीर्थानां दर्शनं प्रति |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
यच्च मामात्थ गाङ्गेय़ वाणघातरुजं प्रति |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
यच्च मामात्थ देव त्वं पाण्डवं फल्गुनं प्रति |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
यच्च मामाह भीष्मोऽय़ं तत्सत्यं भरतर्षभ ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
यच्च मूर्तिमय़ं किञ्चित्सर्वत्रैतन्निदर्शनम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
यच्च मे फलमाधाने तेन संय़ुज्यतां भवान् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यच्च युष्मासु पापं वै धार्तराष्ट्रः प्रय़ुक्तवान् |
६६ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
यच्च राष्ट्रात्प्रच्यवनं कुरूणामवधश्च यः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वय़ा ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मय़ा |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
यच्च वः प्रेक्षमाणानां सर्वधर्मोपचाय़िनी |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
यच्च विक्षोभ्य महतीं सेनां संलोड्य चासकृत् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
यच्च विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम् |
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यच्च विश्वं महत्पाति महादेवस्ततः स्मृतः ||
८ ख