chevron_left  यौवनस्थांश्चarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
यौवनस्थांश्च वालांश्च वृद्धान्गर्भगतानपि |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनस्थाश्च वालाश्च वृद्धाश्च जनमेजय़ ||
७२ ग
स्त्री पर्व
अध्याय ३
विदुर उवाच
यौवनस्थोऽपि मध्यस्थो वृद्धो वापि विपद्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनाश्वो यदाङ्गारं समरे समय़ोधय़त् |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सवलः पुरा |
१३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनेन चरन्कामान्युवा युवतिभिः सह |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ७९
यय़ातिरु उवाच
यौवनेन चरेय़ं वै विषय़ांस्तव पुत्रक ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनेन त्वदीय़ेन चरेय़ं विषय़ानहम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यौवनेन त्वदीय़ेन चरेय़ं विषय़ानहम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यौवराज्येन कौरव्यो भीमसेनमय़ोजय़त् ||
८ ग
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यौय़ुधानिं सरस्वत्यां पुत्रं सात्यकिनः प्रिय़म् |
६९ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
यय़ा कैलासभवने महेश्वरसखं वली |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यय़ा तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारय़तेऽर्जुन |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
धृतराष्ट्र उवाच
यय़ा त्वमभिजानासि त्रिय़ुगं मधुसूदनम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यय़ा धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
यय़ा धृत्या निहतं तामसास्त्रं; युगे युगे राक्षसाश्चापि घोराः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
यय़ा धृत्या सर्वभूतान्यजैषी; र्ग्रासं ददद्वह्नय़े खाण्डवे त्वम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यय़ा निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लव्धचेतसम् ||
११८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
यय़ा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं च प्रमोदते ||
२४ ग
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
यय़ा माय़ाविनो दृप्तान्सुवहून्धनदालय़े |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
यय़ा यान्ति परां सिद्धिं तद्भावगतचेतसः ||
१६० ग
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यय़ा वध्यः समरे सव्यसाची; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
युधिष्ठिर उवाच
यय़ा वुद्ध्या नुदेच्छोकं तन्मे व्रूहि पितामह ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
युधिष्ठिर उवाच
यय़ा वुद्ध्या महीपालो भ्रष्टश्रीर्विचरेन्महीम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
यय़ा वृत्त्या महीपालो विवर्धय़ति मानवान् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
शुक उवाच
यय़ा सन्तः प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्णितम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
यय़ा सर्वमिदं व्याप्तं जगत्स्थावरजङ्गमम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यय़ा सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यय़ा स्वप्नं भय़ं शोकं विषादं मदमेव च |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
यय़ा हिमवतः पृष्ठे निर्माल्येव प्रवेरिता ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
यय़ाचे क्षुधितश्चैनं समांसं भोजनं तदा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिं नाहुषं चैव मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यय़ातिं शुभकर्माणं देवैर्यो याजितः स्वय़म् |
१६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
यय़ातिं स्वर्गतो भ्रष्टं तारय़ामासुरञ्जसा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
यय़ातिः क्षीणपुण्यश्च धृत्या लोकानवाप्तवान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिः पालय़ामास साक्षादिन्द्र इवापरः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
जनमेजय़ उवाच
यय़ातिः पूर्वकोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
यय़ातिमव्रवीद्राजन्देवराजस्य शासनात् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
यय़ातिरपि पूर्वेषां राज्ञां वृत्तमनुष्ठितः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिरव्रवीत्तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
यय़ातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः; पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
यय़ातिरु उवाच
यय़ातिरस्मि राजर्षिः क्षीणपुण्यश्च्युतो दिवः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिरासीद्राजर्षिर्देवराजसमद्युतिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
यय़ातिरिव चोदारः सोमवत्प्रिय़दर्शनः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ातिरिव राजेन्द्र श्रद्धादमपुरःसरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
यय़ातिरुपजिघ्रन्वै निपपात महीं प्रति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
यय़ातिर्दिव्यसंस्थानो वभूव विगतज्वरः ||
१ ख