उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
यादृगेव पुरा वृत्तं रामरावणय़ोर्नृप ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
यादृग्जय़द्रथवधे द्रोणेन विहितोऽभवत् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
यादृग्धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यादृग्भीष्मस्तथा द्रोणो यादृक्कर्णश्च संय़ुगे |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
यादृग्रूपा हि ते छाय़ा प्रसन्नश्च जनार्दनः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
यादृङ्मध्यगते सूर्ये युद्धमासीद्विशां पते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
राजपुत्र उवाच
यादृच्छिकं ममासीत्तद्राज्यमित्येव चिन्तय़े |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
यादृच्छिको युधि जय़ो दैवो वेति विचारणम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
यादृशं कृतवानद्य त्वमेकः शत्रुतापनः ||
२५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
यादृशं कृतवान्युद्धं शिनेर्नप्ता महाय़शाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
यादृशं कृतवान्राजा पुत्रस्तव विशां पते ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यादृशं तत्र पार्थस्य तावकाः सम्प्रचक्रिरे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यादृशं ते कृतं पार्थ जय़द्रथवधं प्रति ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
यादृशं दीय़ते दानं तादृशं फलमाप्यते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
यादृशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिमं भृशम् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
यादृशं न कदाचिद्धि दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
यादृशं न मय़ा युद्धं दृष्टपूर्वं विशां पते ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
यादृशं नगरं राजा स्वय़मावस्तुमर्हति ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
यादृशं पृथिवी भूतं तादृशं व्रूहि वै द्विजम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
शल्य उवाच
यादृशं मे वलं वाह्वोः सम्पदस्त्रेषु या च मे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यादृशं रक्षणे राज्ञः कार्यमात्ययिकं हि नः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
यादृशं वपते वीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
यादृशं समरे पूर्वं जम्भवासवय़ोरभूत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
यादृशं हि पुरा वृत्तं रामरावणय़ोर्मृधे ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
यादृशं ह्यभवद्राजञ्जम्भवासवय़ोः पुरा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
यादृशः पुरुषस्यात्मा तादृशं सम्प्रभाषते |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतां वर |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
यादृशानि निमित्तानि मम प्रादुर्भवन्ति वै |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
यादृशानि हि रूपाणि दृश्यन्ते नो महारणे |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यादृशान्यत्र रूपाणि सन्दृश्यन्ते वहून्यपि |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
यादृशी देवराजस्य पुरीवर्यामरावती ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
यादृशे कुण्डले चैव कवचं चैव यादृशम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
यादृशे च कुले जन्म सर्वराजाभिपूजिते |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गतः सर्वपार्थिवान् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्वरम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं वृतेन वै |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यादृशैः संनिवसति यादृशांश्चोपसेवते |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
यादृशैः संविवदते यादृशांश्चोपसेवते |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
यादृशो मे न तत्रासीद्दुःखे परमके तदा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
यादृशो मे सुतः पण्डुस्तादृशो मेऽसि पुत्रक |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
यादृशो वै पुरा वृत्तः शम्वरामरराजय़ोः ||
३० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
यादृशोऽग्निः समिद्धो हि तादृक्पार्थो न संशय़ः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
यानं चाश्वतरीय़ुक्तं तस्य शुभ्रं विशां पते |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
यानं वस्त्रमलङ्कारं यच्चान्यत्सम्प्रय़च्छति |
४३ क