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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
याजय़ेय़महं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
याजय़ैनं विश्वजिता सर्वस्वेन विय़ुज्यताम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यातं वार्ष्णेय़ं यत्र तौ कृष्णपार्थौ; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
यातनां निरय़े रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
यातनाः प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
याता मृत्युवशं ते वै येषां क्रुद्धोऽसि पाण्डव ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
यातानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
याति देहमय़ं भुक्त्वा कदाचित्परमां गतिम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
याति संहर्षय़न्सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
यातु कश्चित्तु पाञ्चाल्यं क्षिप्रमागम्यतामिति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
यातु कालस्तथा मृत्युर्मुञ्चार्जुनक पन्नगम् ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
कश्यप उवाच
यातु स्त्रिय़ं दिवा चैव विसस्तैन्यं करोति यः ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
यातुधाना हि वहवो राक्षसाः पर्वतोपमाः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
यातुधानाश्च वहवो राक्षसास्तिग्मतेजसः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
यातुधानी ह्यतिक्रुद्धा कृत्यैषा वो वधैषिणी |
७९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
याते त्रिगर्तं मत्स्ये तु पशूंस्तान्स्वान्परीप्सति |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
यातेषु कुरुषु क्षत्ता दाशार्हमपराजितम् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
वासुदेव उवाच
यातेषु मृगय़ां तेषु तृणविन्दोरथाश्रमे ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
यात्यमोघो महाय़क्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यात्येतां मृष्टसलिलामापगां सागरङ्गमाम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
यात्रां याय़ादविज्ञातमनाक्रन्दमनन्तरम् |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
यात्रां याय़ाद्वलैर्युक्तो राजा षड्भिः परन्तप |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यात्राकालाश्च चत्वारस्त्रिवर्गस्य च विस्तरः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
यात्रामाज्ञापय़ेद्वीरः कल्यपुष्टवलः सुखी |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणय़ात्रिकम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणय़ात्रिकम् ||
२९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
यात्रार्थं पुत्रदारस्य मृगान्हन्ति न कामतः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
यात्रार्थं भोजनं येषां सन्तानार्थं च मैथुनम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
यात्रार्थमद्यादाहारं व्याधितो भेषजं यथा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
यात्रार्थमाहारमिहाददीत; तथास्य स्याज्जाठरी द्वारगुप्तिः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
यात्राय़ानेषु युद्धेषु लव्धप्रशमनेषु च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
यात्वा चाहं कुरून्सर्वान्युष्मदर्थमहापय़न् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
यात्वा देवव्रतेनापि मद्राणां पुटभेदनम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
यातय़ामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
यातय़ामानि देय़ानि शूद्राय़ परिचारिणे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
याथातथ्यमविज्ञाय़ शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
याथातथ्येन भगवन्वक्तुमर्हसि मेऽनघ ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
याथातथ्येन साङ्ख्येषु योगेषु च महात्मसु ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
यादवस्तस्य च सुतः शूरस्त्रैलोक्यसंमतः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
यादवानां कुलकरो वलवान्वीर्यसंमतः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यादवानामिमं वंशं पौरवाणां च सर्वशः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
यादवीपुत्र भद्रं ते श्रोतुमर्हसि तावपि ||
६९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यादवौ यादवीं द्रष्टुं स्वसारं तां पितुस्तदा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
यादसामत्र राज्येन सलिलस्य च गुप्तय़े |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
यादृक्क्षय़मनीकानामकरोत्सात्यकिर्नृप |
२८ ख