सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ||
१३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि सङ्क्षिप्य मधुसूदन |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवश्च्युता ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते हुतभुक्चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षय़ः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
युगार्धं छिन्नमादाय़ प्रदुद्राव तथा हय़ः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
युगे युगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभोगिनः ||
५३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
युगे युगे मानुषं चैव वासं; पुनः पुनः सृजते वासुदेवः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
युगे युगे ह्यादिधर्माः प्रवृत्ता; लोकज्येष्ठं क्षत्रधर्मं वदन्ति ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
युगेषां चिच्छिदे वाणैर्ध्वजं चैव न्यपातय़त् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
युगेष्वावर्तते योंऽशैर्दिनर्त्वनय़हाय़नैः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
युगेष्वावर्तमानेषु धर्मो व्यावर्तते पुनः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
युगेष्वीषासु छत्रेषु ध्वजेषु च हय़ेषु च |
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
युगैर्युगानि संश्लिष्य युय़ुधुः पार्थिवर्षभाः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
युज्यतां मे रथवरः फल्गुनाप्रतिमद्युते |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
युज्यतां रथमुख्यानां कल्प्यतां चैव दन्तिनाम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि ते मताः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ||
१३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाः सन्धुक्षय़न्ति च ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
युञ्जन्ते चाप्यलङ्कारांस्तथोपकरणानि च ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी निय़तमानसः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
जय़द्रथ उवाच
युञ्जानमनुय़ुञ्जीत न श्रिय़ः सङ्क्षय़े वसेत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
युञ्जीरन्वाप्यनडुहः क्षन्तव्यं वा तदा भवेत् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
युद्धं कृत्वा तु कौन्तेय़ो द्रोणपुत्रेण भारत |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
युद्धं कृत्वा दिनान्पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् |
९४ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
युद्धं च पृष्ठगमनं पृथिवीक्षय़कारकम् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
युद्धं तदभवद्घोरं भैम्यलाय़ुधय़ोर्नृप |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
युद्धं तु तद्यथा वृत्तं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धं तूपेय़तुस्तत्र राजञ्शल्यवृकोदरौ |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
युद्धं पिता मे हृष्टात्मा विस्मितः प्रत्यपद्यत ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
युद्धं मदन्तमेवास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
युद्धं मम सदा वाणी याचतीति विकत्थसे |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
युद्धं ममैभिरुचितं ज्ञातिभिर्मधुसूदन ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
युद्धं यादृशमेवासीत्तां रात्रिं सुमहाभय़म् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धं वर्षसहस्राणि द्वात्रिंशदभवत्किल ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धं समभवत्तत्र सुसंरव्धं महात्मनोः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
युद्धकाङ्क्षिणमाय़ान्तं नैतत्सममिवार्जुन ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
युद्धकामो महावाहुः समहृष्यत वीर्यवान् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
युद्धकाले त्वय़ास्माकं साह्यं देय़मिति प्रभो ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
युद्धकाले पुनः प्राप्ते तदैव भवता यदि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
युद्धज्ञश्चास्मि वृष्णीनां नात्र किञ्चिदतोऽन्यथा ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
युद्धदीक्षां प्रविश्याजौ रणय़ज्ञं वितत्य च |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
युद्धधर्मं विजानन्वै युध्यन्तमपलाय़िनम् |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
युद्धधर्मेषु सर्वेषु क्रिय़ाणां नैपुणेषु च |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धपूर्वेण मानेन पूजय़ा च महावलः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
युद्धभागी भवेन्मर्त्यः श्राद्धं कुर्वंश्चतुर्दशीम् |
१७ क