chevron_left  युध्यमानाश्चarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानाश्च समरे योधा वध्यन्ति सर्वतः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानेषु वीरेषु पश्यत्सु च समन्ततः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानेषु वीरेषु सैन्धवस्याभिरक्षिषु |
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
युध्यमानो मय़ा सङ्ख्ये विय़दभ्यागमत्पुनः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यमानौ महात्मानौ यूथपाविव सङ्गतौ ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
युध्यस्व कौरवस्यार्थे ममैष सततं वरः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
युध्यस्व कौरवस्यार्थे वर एष वृतो मय़ा ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गाः पितृनिवेशनम् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
युध्यस्व गच्छ कौन्तेय़ पृच्छ मां किं व्रवीमि ते ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
युध्यस्व तानद्य रणे पश्यामः पुरुषो भव ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
राम उवाच
युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्व्य कौरव ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
युध्यस्व निरहङ्कारो वलवीर्यव्यपाश्रय़ः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
युध्यस्व पार्थं समरे येन विस्पर्धसे सह |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
युध्यस्व यत्नमास्थाय़ परं पार्थेन संय़ुगे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
युध्यस्व यत्नमास्थाय़ मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
युध्यस्व राजधर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
युध्यस्व समरे वीरो भूत्वा कौरवनन्दन ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
युध्यस्व सहितोऽस्माभिर्दुरात्मन्पुरुषाधम ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं धनञ्जय़मरिन्दम |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
युध्यामहेऽर्जुनं सङ्ख्ये दानवा वासवं यथा ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
युध्येतां समरे वीरौ चित्रं लघु च सुष्ठु च |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
युध्येतामनुरूपेण विक्रमेण सुविक्रमौ ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
युध्येद्दुर्योधनं सङ्ख्ये कृतित्वाद्धि विशेषय़ेत् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
युध्येय़ं क्षत्रिय़ान्सर्वान्पाण्डवेष्वातताय़िनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
युध्येय़ं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
युध्येय़ुरिति मे वुद्धिर्वर्तते नात्र संशय़ः ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
युनक्ति मेधय़ा धीरो यथाशक्ति यथावलम् ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वासुदेव उवाच
युनक्तु नो भवान्कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
युवनाश्वं नरपतिं तदद्भुतमिवाभवत् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
युवनाश्वेन च तथा शिविनौशीनरेण च ||
६६ ग
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
युवनाश्वो मय़ेत्येव सत्यं समभिपद्यत ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
युवराजश्च चेदीनां मालवश्च सुदर्शनः |
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
युवराजस्तु विंशत्या द्रौणिं विव्याध पत्रिणाम् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
युवराजे हते चैव वृद्धक्षत्रे च पौरवे |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
शकुन्तलो उवाच
युवराजो महाराज सत्यमेतद्व्रवीहि मे |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
युवराजोऽस्तु ते राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग्दिव्यकुण्डलः |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
युवा रूपेण सम्पन्नो दर्शनीय़ो महाय़शाः |
९६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
युवा रूपेण सम्पन्नो विद्ययाभिजनेन च |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
युवा वृन्दारकः शूरो विकर्णः पुरुषर्षभ |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
युवा वृन्दारको नित्यं प्रवरस्त्रीनिषेवितः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
युवा षोडशवर्षो हि यदद्य भविता भवान् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
वैशम्पाय़न उवाच
युवां च कुरुतां वुद्धिं भवेद्या नः सुखोदय़ा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
युवां दिशो जनय़थो दशाग्रे; समानं मूर्ध्नि रथय़ा विय़न्ति |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
युवां वर्णान्विकुरुथो विश्वरूपां; स्तेऽधिक्षिय़न्ति भुवनानि विश्वा |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
युवां विजय़िनौ चापि दिष्ट्या पश्यामि संय़ुगे |
३० क
वन पर्व
अध्याय १९४
भगवानु उवाच
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
युवानं रूपसम्पन्नं करिष्यावः पतिं तव ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
युवानमवहन्युद्धे क्रौञ्चवर्णा हय़ोत्तमाः |
१९ क