अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
यक्षा नागाः पिशाचाश्च लोकपाला हुताशनाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
यक्षा नागास्तथा दैत्या ये चान्ये वलगर्विताः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यक्षाः साध्याः पिशाचाश्च गुह्यकाः पितरस्तथा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
यक्षाणां घोररूपाणां विविधाय़ुधधारिणाम् ||
५१ ग
वन पर्व
अध्याय
२७५
व्रह्मो उवाच
यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संय़ुगे |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
यक्षाणामधिपः श्रीमान्कैलासनिलय़ः प्रभुः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षय़ोऽमलाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यक्षानुगा महाराज धनिनः प्रिय़दर्शनाः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
यक्षान्सुपर्णान्कालेय़ान्गन्धर्वाप्सरसस्तथा ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशां पते ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च; निद्रावशं त्वा परिधर्षय़ेय़ुः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः |
९० क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते भ्रूणहत्यया ||
९० ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सराः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना |
११५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
यक्षेणर्द्धिमता राजन्स्थूणाकर्णेन पालितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
यक्षेन्द्रं मनुजश्रेष्ठ माणिभद्रमुपासते ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षेन्द्राय़ कुवेराय़ मणिभद्राय़ चैव ह |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय़ मोदतेऽप्सरसां गणैः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यक्षैश्चापि महावीर्यैर्मणिमत्प्रमुखैस्तथा ||
११३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
यक्षो वाप्यथ वा देवो गन्धर्वो राक्षसोऽपि वा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा विजित्य पृथिवीमिमाम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यक्ष्यमाणेषु सर्वेषु दानवेषु तदा मय़ा |
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
यच्च कर्णोऽव्रवीत्कृष्णां सभाय़ां परुषं वचः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यच्च कर्णोऽव्रवीत्कृष्णां सभाय़ां परुषं वचः |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च किञ्चित्तपोय़ुक्तं फलं तीर्थेषु भारत |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
यच्च किञ्चित्त्रिलोकेऽस्मिन्दृश्यते स्थाणुजङ्गमम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यच्च किञ्चित्त्वय़ा प्राप्तं मय़ि क्लेषात्मकं द्विज |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यच्च किञ्चित्त्वय़ा लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च किञ्चित्पुरा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
यच्च किञ्चित्सुखं तच्च सर्वं दुःखमिति स्मरन् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यच्च किञ्चिन्मय़ा लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् |
१०९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यच्च किञ्चिन्मय़ाज्ञानात्पुरस्ताद्विप्रिय़ं कृतम् |
९९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च कुर्यान्न तत्कार्यं प्रष्टव्या सा त्वय़ानघ |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च कोपितय़ात्यर्थं त्वय़ोक्तोऽस्म्यप्रिय़ं प्रिय़े |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
यच्च तत्कथितं पूर्वं त्वय़ा हय़शिरो महत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
यच्च तत्क्षरमित्युक्तं यत्रेदं क्षरते जगत् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यच्च तद्धार्तराष्ट्राणां क्रूरैः षड्भिर्महारथैः |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च तद्रुक्मपात्रीभिर्व्राह्मणेभ्यः सहस्रशः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
वैशम्पाय़न उवाच
यच्च तद्वचनं तस्य त्वय़ा यच्चेह भाषितम् |
२३ क