आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
याजकैः शुक्लवासोभिर्हूय़माना हुताशनाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
याजकैरभ्यनुज्ञातं प्रेतकर्मणि निष्ठितैः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
याजनं हि ममाप्येवं वर्तते त्वय़ि पार्थिव ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
याजनाध्यापनं दानं तथैवाहुः प्रतिग्रहम् |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
याजनाध्यापनरताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
याजनाध्यापने चोभे तथैवाहुः परिग्रहम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
याजनाध्यापने चोभे व्राह्मणानां प्रतिग्रहः |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
याजनाध्यापने चोभे शुद्धाच्चापि प्रतिग्रहः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
याजनाध्यापने दानं तथा यज्ञप्रतिग्रहौ ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
याजनाध्यापने युक्ता नित्यं तान्पूजय़ाम्यहम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
याजनाध्यापने युक्ता यत्र तद्राष्ट्रमावसेत् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
याजनाध्यापनैर्विप्रा विशुद्धैश्च प्रतिग्रहैः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाह्वापय़त्तदा |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
याज उवाच
याजेन श्रपितं हव्यमुपय़ाजेन मन्त्रितम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
याजो द्रोणविनाशाय़ प्रतिजज्ञे तथा च सः ||
३० ग
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
याजोपय़ाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
याजोपय़ाजौ व्रह्मर्षी शाम्यन्तौ पृषतात्मजः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
याज्ञवल्क्यमृषिश्रेष्ठं दैवरातिर्महाय़शाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
याज्ञवल्क्यश्च विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रतः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
याज्ञवल्क्यस्य संवादं जनकस्य च भारत ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञवल्क्यो वभूवाथ व्रह्मिष्ठोऽध्वर्युसत्तमः |
३५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेनी भ्रष्टय़ोगा निपपात महीतले ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशां पते |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजुः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेनीमथो यत्र सिन्धुराजोऽपकृष्टवान् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्वाक्यं विव्रूत पार्थिवाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽव्रवीत् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञसेन्याः परामृद्धिं दृष्ट्वा प्रज्वलितामिव |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
याज्ञसेन्यास्तदा पार्थ न तस्य स्मर्तुमिच्छसि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
याज्यतः शिष्यतो वापि कन्यया वा धनं महत् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
याज्यमानं मय़ा हि त्वां वृहस्पतिपुरन्दरौ |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
याज्यस्त्वङ्गिरसः पूर्वमासीद्राजा करन्धमः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
याज्यात्मजमथो दृष्ट्वा गतासुमृषिसत्तमाः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
याज्यान्सर्वानुपादाय़ प्रतिगृह्य पशूंस्ततः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह्य विधानतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
याज्यो मम स यद्व्रूय़ात्तत्कार्यमविशङ्कय़ा ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
याज्योऽस्मि भवतः साधो तत्प्राप्नुहि विधत्स्व च ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
याजय़ामास तं कण्वो दक्षवद्भूरिदक्षिणम् |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
याजय़ामास यं विद्वान्स्वय़मेवाङ्गिराः प्रभुः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
याजय़ामास विधिवद्वाजिमेधेन शौनकः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
याजय़ित्वा ततो याज्याँल्लव्ध्वा च सुवहून्पशून् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
याजय़िष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानुपकल्पय़ ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
याजय़ेथा मरुत्तं त्वं मर्त्यधर्माणमातुरम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
याजय़ेर्मृत्युसंय़ुक्तं मरुत्तमविशङ्कय़ा ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
व्यास उवाच
याजय़ेय़ं कथञ्चिद्वै स हि पूज्यतमो मम ||
११ ख