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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
युगरूपो महारूपः पवनो गहनो नगः ||
१२२ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
युगसङ्ख्यां महावाहो स्वस्ति प्राप्नुहि गम्यताम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
भीम उवाच
युगसङ्ख्यां समाचक्ष्व आचारं च युगे युगे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
युगसाहस्रय़ोरादावह्नो रात्र्यास्तथैव च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
युगस्यादौ निमित्तं तन्महद्दिव्यं प्रचक्षते |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
युगह्रदौघमध्येन व्रह्मप्राय़भवेन च |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
युगादिकालशय़नं विष्णोरमिततेजसः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमाय़ो महाशनः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
युगानामाय़ुषो ह्रासं विज्ञाय़ भगवाञ्शिवः |
८७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
युगानि पर्यकर्षन्त तत्र तत्र स्म भारत ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
युगानुवर्तनं त्वेतत्कुर्वन्ति चिरजीविनः ||
३७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
युगान्त इव कालेन पातितं सूर्यमम्वरात् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
युगान्तकालसमय़े दण्डहस्तमिवान्तकम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
युगान्तकाले यन्तेव रौद्रां प्रास्कन्दय़न्नदीम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
युगान्तकाले सङ्क्रुद्धः पिनाकीव महावलः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्तकाले सम्प्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिणः ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्तकाले सम्प्राप्ते भूतानां दह्यतामिव |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
युगान्तप्रतिमौ वीरौ रेजतुर्भास्कराविव ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे वले ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्मं यौधिष्ठिरे वले |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्तसमरूपाणि भूतोत्सादाय़ भारत ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान्प्रधक्ष्यन्वै पुनः प्रजाः ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान्हिमवानिव च स्थिरः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
युगान्ताग्निसमः क्रोधे सिंहग्रीवो महामतिः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
युगान्ताग्निसमो भीष्मः परेषां समपद्यत ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
युगान्तादित्यरश्म्याभैः पाण्डवास्तशरैर्हताः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्तानिलसङ्क्षुव्धौ महावेगाविवार्णवौ ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
युगान्ते कृष्ण सम्भूताः कुलेषु पुरुषाधमाः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते चान्तको राजञ्जामदग्न्यश्च वीर्यवान् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
युगान्ते चैव सम्प्राप्ते रुद्रमङ्गात्सृजत्प्रभुः ||
१८३ ग
वन पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
युगान्ते दारुणे प्राप्ते कृत्स्नं संहरते जगत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वृत्तिलोभात्करिष्यति ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति वहुजन्तवः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपय़ास्यति ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
युगान्ते स सुप्तः सुसङ्क्षिप्य लोका; न्युगादौ प्रवुद्धो जगद्ध्युत्ससर्ज ||
८९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्ते समनुप्राप्ते द्वय़ोः सागरय़ोरिव ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च व्रह्मचारिणः |
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते समुपेतौ द्वौ दृश्येते सागराविव ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तकः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव दिधक्षतः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि त्रासय़न्ती यथाशनिः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि दग्ध्वेव वसुरुल्वणः |
९९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि दिधक्षुरिव चोद्यतः ||
११२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि धूमकेतुरिवोत्थितः ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ||
५३ ख