आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
यदि चास्मि प्रतिग्राह्यः साम्प्रतं तद्व्रवीहि मे ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतां सुहृदां ततः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५८
दमय़न्त्यु उवाच
यदि चाय़मभिप्राय़स्तव राजन्व्रजेदिति |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यदि चेत्खादको न स्यान्न तदा घातको भवेत् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
यदि चेदप्यसम्वन्धो मित्रभावेन वर्तते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
यदि चेद्भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यदि चैव परान्युद्धे सूतपुत्रमुखान्रथान् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
यदि जप्यफलं दत्तं मय़ा नेषिष्यसे नृप |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
यदि जम्वुकवाक्यानि निष्फलान्यनृतानि च |
९८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
यदि जानाति चार्वाकः परिव्राड्वाग्विशारदः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
यदि जानाति मां राजा धर्मात्मा संशितव्रतः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रिय़म् |
१२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
यदि जीवति नो राजा तस्मै शंसामहे प्रिय़म् ||
१५१ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि जीवति रोषेण मय़ा पापेन निर्धुतः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन्न तु संवदे ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तच्छक्यमस्माभिः श्रोतुं न च सदोषवत् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
युधिष्ठिर उवाच
यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तत्प्राप्नुय़ामेह धनमाविक्षितं प्रभो |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतय़ः परे ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
यदि तद्विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जय़द्रथम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
यदि तस्य रणे साह्यं कुरुते वज्रभृत्स्वय़म् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
यदि तां वुद्धिमास्थाय़ चरेय़ुः पर्णिनो वने |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
यदि तात ददास्येते वज्रिणे कुण्डले शुभे |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
यदि तान्योधय़िष्यामः किं वा नः परिहास्यति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
यदि तावच्छमं कुर्यान्न्याय़ेन कुरुपुङ्गवः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
यदि तावत्कृता वुद्धिः पलाय़नपराय़णा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
यदि तावदनुद्युक्तः शेते कामसुखात्मकः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
यदि तावद्रणे पार्थो व्यतिक्रान्तो महारथः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
यदि तावद्वने वासो यथोक्तश्चरितस्त्वय़ा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
यदि तावन्न गृह्णामि व्राह्मणेनापवर्जितम् |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तावन्मय़ा क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वय़म् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
यदि तावन्मय़ा द्रोणो निहतो व्राह्मणव्रुवः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
यदि तिष्ठति सङ्ग्रामे मुहूर्तमपि पाण्डवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तु त्वं प्रसन्नो मे स्वय़मेनां प्रचोदय़ ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
कुशिक उवाच
यदि तु प्रीतिमान्विप्र मय़ि त्वं भृगुनन्दन |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
युधिष्ठिर उवाच
यदि तुल्यं व्रतं शौचं दय़ा चात्र पितामह |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
यदि ते कृतमाज्ञाय़ नमस्कुर्युः सदैव तम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
सत्यवानु उवाच
यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रिय़म् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यदि ते प्रतिगृह्णीय़ुः श्रद्धापूतं युधिष्ठिर |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भार्यो उवाच
यदि ते रोचते राजन्वक्ष्यामि शृणु मे वचः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
यदि ते रोचते सौम्य भुजगोत्तम माचिरम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
यदि ते वर्तते वुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वय़म् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
यदि ते विहितं राज्यं भविष्यति विशां पते ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
यदि ते वृत्ततो राजन्व्राह्मणः प्रसमीक्षितः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
यदि ते व्राह्मणेष्वस्ति काचित्प्रीतिर्जनाधिप |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
यदि ते श्रवणे वुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यदि ते सोऽनुजः कृष्णः प्रविष्टोऽनुमते मम |
८१ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
यदि ते हृदय़ं वेत्ति यदि ते प्रत्ययो मय़ि |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
यदि तेन पुरा मुक्तो भीमसेनो वकेन वै |
३६ क