chevron_left  यष्टव्यंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
यष्टव्यं चाप्रमत्तेन दातव्यं चानसूय़ता ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
यष्टव्यं पशुभिर्मेध्यैरथो वीजैरजैरपि ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय़ स सात्त्विकः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
यष्टा क्रतुसहस्राणां दाता दानपतिः प्रभुः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
यष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाव्रवीत् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक्चैव प्रशासिता |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
यष्टुमिच्छति यज्ञं यः साधुमेव वदन्ति तम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तमनु स मामनु |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
यस्तं प्रतीपस्तरसा प्रत्युदीय़ा; दाशंसमानो द्वैरथे वासुदेवम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
यस्तं वेत्ति स मां वेत्ति योऽनु तं स हि मामनु ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुय़ात् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
यस्तज्जानन्न गवां हार्दमेति; स वै गन्ता निरय़ं पापचेताः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तताप तपो घोरं सदारः पृथिवीपतिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
यस्तत्त्वतो विजानाति लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
यस्तत्र कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम् |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
यस्तथाभावितात्मा स्यात्स गामालव्धुमर्हति ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
यस्तद्वेदोभय़ं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्तमोऽर्क इवापोहन्परसैन्यममित्रहा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाप्यनुचिन्तय़ेत् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
यस्तस्यार्थो न रोचेत न तं तस्य प्रकाशय़ेत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
यस्तांस्त्यजति शव्दादीन्सर्वाश्च व्यक्तय़स्तथा |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
यस्तात न क्रुध्यति सर्वकालं; भृत्यस्य भक्तस्य हिते रतस्य |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तान्द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु स मामनु |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
यस्तान्पाशान्वशे कृत्वा तं वृक्षमपकर्षति |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
यस्तान्यमय़ते वुद्ध्या स यन्ता न निवर्तते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्तामेवं विजानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधुनोः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
यस्तु कर्तास्य वैरस्य निकृत्या निकृतिप्रिय़ः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीय़ते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यस्तु कल्यं तथा साय़ं भुञ्जानो नान्तरा पिवेत् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
यस्तु कामान्परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रिय़ः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
जरितारिरु उवाच
यस्तु कृच्छ्रमसम्प्राप्तं विचेता नाववुध्यते |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञय़ा प्रतिवाधते |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
यस्तु क्षत्रगतो देवि त्वय़ा धर्म उदीरितः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
यस्तु ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
यस्तु चोरय़ते तैलं तैलपाय़ी प्रजाय़ते |
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
यस्तु तस्या जलं सेवेत्कृतकृत्यः पुमान्भवेत् ||
७२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु तां स्पर्धय़ा क्षुद्रः पाञ्चालीमानय़त्सभाम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
यस्तु तिष्ठति कौन्तेय़ धारणासु यथाविधि |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
यस्तु ते विषय़ं गच्छेन्मन्त्रो वर्णः स्वरोऽपि वा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु ते व्याहृतान्प्रश्नान्प्रतिव्रूय़ाद्विशेषवित् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
यस्तु ते सोऽग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते |
६९ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद्वहिष्यति |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
यस्तु दद्यादकुप्यन्हि तस्य लोकाः सनातनाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
यस्तु दूषय़िता तस्याः शेषं प्राप्नोति किल्विषम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
यस्तु देवि यथान्याय़ं दीक्षितो निय़तो द्विजः |
५२ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु देशः प्रिय़स्तस्य जीवतोऽभून्महात्मनः |
२३ क