chevron_left  यतमानोऽपिarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
यतमानोऽपि तद्राज्यं न शशाकेति नः श्रुतम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषय़ति स्म ह ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
यतमानोऽर्जुनं प्रीत्या प्रत्यवारय़दुत्स्मय़न् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
यतमानौ तु तौ वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
यतश्च जातः संरम्भः स च शत्रुर्वशं गतः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च; यतश्च लोका विहिता विधात्रा |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
यतश्चाय़ं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यतश्चैतद्यथा चैतद्देवसत्रे महामते ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यतश्छिद्रं ततश्चापि नय़न्ते धीधना वलम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
यतस्ततो मां कौन्तेय़ सदारं मन्युराविशत् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
यतस्त्वं पुरुषव्याघ्र मामेवाद्य जिघांससि ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
यतस्त्वनुग्रहकृता वुद्धिस्ते मय़ि माधव |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
यतस्त्वय़ा कृतं पूर्वं विचित्रं कर्म दुष्करम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
यतस्व तेषां मोक्षाय़ जरासन्धवधाय़ च ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
पितर ऊचुः
यतस्व यत्नवांस्तात सन्तानाय़ कुलस्य नः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
यतादृष्टं भय़ं व्रह्म प्रजानां शमय़त्युत |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
यतामहे पूजय़ितुं गोविन्द न च शक्नुमः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
यतामि नित्यं तव कर्तुमिष्टं; दारैः सुतैर्जीवितेनात्मना च |
८२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
यताहारं क्षितिशय़ं नाविन्दं भ्रातृभिः सह ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यतिं यय़ातिं संय़ातिमाय़ातिं पाञ्चमुद्धवम् |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यतितं धर्मपुत्रेण मय़ा गुह्ये निवेदिते |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यतितं विजय़े नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम् ||
२९ ग
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
यतितं वै मय़ा पूर्वं यथा त्वं वेत्थ व्राह्मणि |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यतितं सर्वय़त्नेन शमं प्रति जनेश्वर ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
यतितः स मय़ा पूर्वं भ्रात्र्यं ज्ञापय़ितुं तव |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
यतिधर्ममवाप्तोऽसौ नैव शोच्यः परन्तप ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
यतिधर्ममुपासंश्चाप्यवसन्मिथिलाधिपः ||
९४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
व्राह्मण उवाच
यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेय़मिति कुत्सय़न् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ||
३० ग
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
यतिष्यन्ते न राज्याय़ स हि तेषां व्यपाश्रय़ः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
यतिष्यामि तथा राजन्व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
अप्सरस ऊचुः
यतिष्यामो वशे कर्तुं व्यपनेतुं च ते भय़म् ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
यतिष्ये प्रशमं कर्तुं युष्मदर्थमहापय़न् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
यतिष्ये प्रशमं कर्तुं लक्षय़िष्ये च चेष्टितम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
यतिष्येते परं शक्त्या स्थितौ वीरगते पथि ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संय़ुगे |
६४ ख
वन पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
यतींश्च सर्वान्स मुनींश्च राजा; तस्मिन्वने मूलफलैरुदग्रैः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
यतेत तस्मिन्प्रामाण्यं गन्तुं यशसि चोत्तमे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
यतेत योगमास्थाय़ मित्रामित्रानवारय़न् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
यतेद्व्राह्मणपूर्वं हि भोक्तुमन्नं गृही सदा |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
यतेन्द्रिय़मनोवुद्धिर्मुनिर्मोक्षपराय़णः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
यतेन्द्रिय़ाः शीलपरास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
यतेन्द्रिय़ाणामथ वा गतिरेषा विधीय़ते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
यतो गृहीत्वा हि करोति यच्च; यस्मिंश्च तामारभते प्रवृत्तिम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
यतो जगत्सर्वमिदं प्रसूतं; ज्ञात्वात्मवन्तो व्यतिय़ान्ति यत्तत् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
यतो दुर्योधनरथस्तं मार्गं प्रत्यपद्यत |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः ||
३६ ख