chevron_left  योऽसावुत्पतितोarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेव प्रहीय़ते ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
योऽसावय़ोध्यां प्रथमं गतवान्व्राह्मणस्तदा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
योऽसृजद्दक्षिणादङ्गाद्व्रह्माणं लोकसम्भवम् |
१८३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
धृतराष्ट्र उवाच
योऽसौ कर्णेन वीरेण वार्ष्णेय़स्य समागमः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ कानीनगर्भो मे पुत्रवत्परिवर्तितः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
योऽसौ कुलाधमो मूढो मय़ा राज्येऽभिषेचितः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
योऽसौ कृष्णामव्रवीद्दुष्टवुद्धिः; कर्णः सभाय़ां कुरुवीरमध्ये |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ गच्छति तेजस्वी वहून्क्लेशानचिन्तय़न् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय १५
सुदेष्णो उवाच
योऽसौ त्वां कामसंमत्तो दुर्लभामभिमन्यते ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
योऽसौ त्वय़ा खाण्डवे चित्रभानुं; सन्तर्पय़ानेन धनुर्धरेण |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ त्वय़ा विनिर्दिष्टो अधिकारोऽर्थचिन्तकः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
योऽसौ दिव्याः कथा वेद देवतासुरसङ्कथाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
योऽसौ देवैर्हतान्दैत्यानुत्थापय़ति विद्यया |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
योऽसौ नागाय़ुतवलो लोकेऽप्रतिरथो रणे |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
योऽसौ नाराय़णो नाम पूर्वेषामपि पूर्वजः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
योऽसौ नित्यं शूरमदेन मत्तो; विकत्थते संसदि कौरवाणाम् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
योऽसौ पाण्डोः किल क्षेत्रे जातः शक्रेण कामिना ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ पुरस्तात्कमलाय़ताक्ष; स्तनुर्महासिंहगतिर्विनीतः |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ पृथिव्याः कृत्स्नाय़ा भर्ता भूत्वा नराधिपः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ भूमिगतः श्रीमान्विष्णुर्मधुनिषूदनः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
योऽसौ ममैव नान्यस्य वान्धवान्युधि जघ्निवान् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
योऽसौ महाभद्रकुलप्रसूतः; सुपूजितो धार्तराष्ट्रेण नित्यम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ युगसहस्रान्ते प्रदीप्तार्चिर्विभावसुः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ युवा स्वाय़तलोहिताक्षः; कृष्णाजिनी देवसमानरूपः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
योऽसौ योनिर्हि सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
योऽसौ रणे नरं नान्यं पृथिव्यामभिमन्यते |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
योऽसौ राजा घृणी नित्यं धार्तराष्ट्रेषु भारत |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
योऽसौ वहति देवानां विमानानि विहाय़सा |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय ३७
शृङ्ग्यु उवाच
योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ वृहद्वारणाभो युवा सुप्रिय़दर्शनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वय़ि नित्यं समाहितः |
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
योऽसौ सदा श्लाघते राजमध्ये; दुर्योधनं हर्षय़न्दर्पपूर्णः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
योऽसौ सर्वान्महीपालान्धर्मेण वशमानय़त् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
योऽस्तूय़त पुरा हृष्टैः सूतमागधवन्दिभिः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
योऽस्त्रं चतुष्पात्पुनरेव चक्रे; द्रोणः प्रसन्नोऽभिवाद्यो यथार्हम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽस्मानाज्ञापय़त्येवं वश्यानिव दिवौकसः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
योऽस्मान्वृणोति तदहं वरय़े साह्यकारणात् ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
योऽस्य सृष्टो विनाशाय़ स एनं श्वो हनिष्यति ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ||
७९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
योऽहं तमर्जुनं विद्धि योऽर्जुनः सोऽहमेव तु |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
योऽहं तां मर्षय़ाम्यद्य तादृशीं श्रिय़मागताम् ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
योऽहं दुष्टमतिं मूढं ज्ञातीनां भय़वर्धनम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
योऽहं न गणय़ाम्येतांस्तृणानीव नराधिपान् ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
योऽहं भवन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं नृप |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
योऽहं सोऽहमिति ह्युक्त्वा गुणाननु निवर्तते ||
४३ ख