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वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
यदा वुध्यति वोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते वा; तदाश्रय़ा अनिकेता भवन्ति ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मय़ा प्रत्याहृता तदा |
९४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यदा वै त्वां फल्गुनवेगनुन्ना; ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वलसमन्वितः |
५० क
वन पर्व
अध्याय २५२
द्रौपद्यु उवाच
यदा शरानर्पय़िता तवोरसि; तदा मनस्ते किमिवाभविष्यत् ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
यदा शारणिकान्राजा पुत्रवत्परिरक्षति |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यदा शिखण्डी रथिनः प्रचिन्व; न्भीष्मं रथेनाभिय़ाता वरूथी |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यदा शिनीनामधिपो मय़ोक्तः; शरैः परान्मेघ इव प्रवर्षन् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यदा शूरं च भीरुं च मारय़त्यन्तकः सदा |
५९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
यदा शूरं च भीरुं च यमः कर्षति भारत |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
यदा श्रव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाप्ययम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
यदा श्राद्धं पितृभ्यश्च दातुमिच्छेत मानवः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
शल्य उवाच
यदा श्रोष्यसि निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
यदा श्वश्रूं स्नुषा वृद्धां परिचारेण योक्ष्यते |
१११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
यदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
यदा स न चलत्येव स्थाणुभूतो महातपाः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
यदा स नाशकत्तस्य निश्चय़ं कर्तुमन्यथा |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ८२
शक्र उवाच
यदा स पूरुस्तव रूपेण राज; ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
यदा स भक्षितस्तेन क्षुधितेन पतत्रिणा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
यदा स रूपतश्चान्यो जातितः श्रुतितोऽर्थतः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यदा स सेनापतिरप्रमेय़ः; पराभवन्निषुभिर्धार्तराष्ट्रान् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
यदा संहरते कामान्कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
यदा संहरते कामान्कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
यदा संहरते चाय़ं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलय़ं याति देहभृत् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
यदा सभाय़ां कौन्तेय़मनक्षज्ञं युधिष्ठिरम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
यदा सभाय़ां सर्वस्वं न्यस्तवान्पाण्डवाग्रजः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
यदा समं कपोतेन तव मांसं भवेन्नृप |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
यदा समन्विता देवाः पशूनां गमनेश्वराः |
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
यदा समर्थो यानाय़ नचिरेणैव भारत ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
यदा सम्यक्प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
यदा सर्वं परित्यज्य गन्तव्यमवशेन ते |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
यदा सर्वे त्रय़ो वर्णास्त्वय़ोक्ता व्राह्मणा इति ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा सर्वे विमनसस्ते मल्ला हतचेतसः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महावल |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा स्कन्दः पतिर्लव्धः शाश्वतो देवसेनय़ा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
यदा स्कन्देन मातॄणामेवमेतत्प्रिय़ं कृतम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेनैव पश्यति |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
यदा स्थानान्यनित्यानि दृश्यन्ते दैवतेष्वपि |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
यदा स्यान्महती सेना हय़नागरथाकुला |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
यदा स्वपक्षो वलवान्परपक्षस्तथावलः |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
यदा स्वपक्षोऽवलवांस्तदा सन्धिं समाश्रय़ेत् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यदा हि क्षमते सर्वं व्रह्म सम्पद्यते तदा ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
यदा हि नेन्द्रिय़ार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |
४ क
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
यदा हि पूर्वं निकृतो निकृत्या; वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक्पश्यति देहभृत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
ऐल उवाच
यदा हि व्रह्म प्रजहाति क्षत्रं; क्षत्रं यदा वा प्रजहाति व्रह्म |
७ क