वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
ये स्म ते कुपितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
ये स्म ते नाद्रिय़न्तेऽऽज्ञा नोद्विजन्ते कदा च न |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
ये स्म न प्रतिगृह्णन्ति दस्युभोजनशङ्कय़ा |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
ये स्म भीमं रणे राजन्योधय़न्तो व्यवस्थिताः |
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
ये स्म वारणशव्देन हय़ानां हेषितेन च |
११ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ये हता व्रह्मशापेन मुसलैरेरकोद्भवैः ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
ये हन्युः शस्त्रवेगेन देवानपि नरर्षभाः ||
२९ ग
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
ये हरन्ति शिशूञ्जातान्गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ||
१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
ये हि ते मुनय़ः ख्याताः सप्त चित्रशिखण्डिनः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
ये हि धर्माः समाख्याताश्चातुर्वर्ण्यस्य भारत |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
ये हि निष्कल्मषा लोके पुण्यपापविवर्जिताः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
ये हि राष्ट्रोपरोधेन वृत्तिं कुर्वन्ति केचन |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखय़ोनय़ एव ते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
ये ह्यतिक्रान्तकाः पूर्वं सहस्रय़ुगपर्ययाः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
ये ह्यतो विच्युता मार्गात्ते हृष्यन्त्युद्विजन्ति च ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
ये ह्येव वीरा ह्रीमन्त आर्याः करुणवेदिनः |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
धृतराष्ट्र उवाच
येन कर्णो महावाहू रथोपस्थे निपातितः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
येन कर्मविपाकेन प्राप्तेय़ं शूद्रता त्वय़ा ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
येन कार्येण सम्प्राप्तौ युवां तत्साधय़ामि वाम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
येन कारय़ते कर्म शुभाशुभफलं विभुः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
येन कृच्छ्रात्पाण्डवानुज्जहार; तथात्मानं नौरिव सागरौघात् ||
३५ ग
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुगः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
शर्मिष्ठो उवाच
येन केनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
येन कौमारके यूय़ं सर्वे विप्रकृतास्तथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
येन क्षराक्षरे वित्ते न भय़ं तस्य विद्यते |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
येन क्षय़ं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
येन खट्वां समारूढः कर्मणानुशय़ी भवेत् |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
येन गच्छति लोकोऽय़ं दत्त्वा शोकमनन्तकम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
धृतराष्ट्र उवाच
येन गत्वा हृषीकेशं प्राप्नुय़ां शान्तिमुत्तमाम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
येन चोग्राय़ुधो राजा चक्रवर्ती दुरासदः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
येन तत्त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद्भस्मीकृतं पुरा |
१२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
येन तत्त्रिपुरं राजन्दैत्यदानवरक्षितम् ||
११४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
येन तद्धनुराय़म्य लक्ष्यं विद्धं महात्मना |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
येन तन्त्रमय़ं तन्त्रं वृत्तिः स्यात्तत्तदाचरेत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
युधिष्ठिर उवाच
येन ताञ्शाश्वताँल्लोकानखिलानश्नुवीमहि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
येन तृप्यत्यभुञ्जानो येन तुष्यत्यवित्तवान् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
येन ते सत्सु निर्वेदं गमिष्यन्तीति मे मतिः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
येन तेन विशेषेण कर्मणा येन केनचित् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
येन तेनाप्युपाय़ेन वृद्धानामिति शासनम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निवोध मे ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
येन त्रिगर्ता निकृता वलेन महता नृप |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वय़त् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
येन त्वं पीडितो वाणैर्दृढमाय़म्य कार्मुकम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
येन त्वं मां महावाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ||
४ ख