स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
ये च ते कथिता व्याला व्याधय़स्ते प्रकीर्तिताः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ये च ते कृष्णाः सिताश्च तन्तवस्ते रात्र्यहनी ||
१७२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
ये च ते पूर्वकथिता धर्मा वननिवासिनाम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
ये च ते सिन्धुराजस्य गोप्तारः पावकोपमाः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
ये च तेऽभ्यद्रवन्द्रोणं व्यूढानीकाः प्रहारिणः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तय़िष्यन्त्यतन्द्रिताः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये च त्वाभिप्रशंसेय़ुर्निन्देय़ुरथ वा पुनः |
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
ये च त्वामनुवर्तन्ते कामलोभवशानुगाः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
ये च त्वामुपजीवन्ति कच्चित्तेऽपि निरामय़ाः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
ये च दम्पतिधर्माणः स्वदारनिय़तेन्द्रिय़ाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ये च दोषसमाय़ुक्ता नराः प्रोक्ता मय़ानघ |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन्पृथिवीपते |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
युधिष्ठिर उवाच
ये च धर्ममसूय़न्ति ये चैनं पर्युपासते |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
ये च धर्माः कुटुम्वेषु श्वश्र्वा मे कथिताः पुरा |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ये च निक्षेपहर्तॄणां ये च विश्वासघातिनाम् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
आस्तीक उवाच
ये च पक्षधरा धर्मे सद्वृत्तरुचय़श्च ये |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये च पुण्येषु तीर्थेषु अभिषेककृतश्रमाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
ये च पूर्वामुपासन्ते द्विजाः सन्ध्यां न पश्चिमाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
ये च भागं प्रगृह्णन्ति यज्ञेषु द्विजसत्तम |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये च भाष्यविदः केचिद्ये च व्याकरणे रताः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
ये च भृत्या मम गृहे प्रीतिमान्भव वासव ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
ये च मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
ये च मूढतमा लोके ये च वुद्धेः परं गताः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
ये च मूढतमा लोके ये च वुद्धेः परं गताः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
ये च रक्षासहाय़ाः स्युः पार्थिवानां युधिष्ठिर |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
ये च वीतभय़ा नित्यं हरस्य भ्रुकुटीभटाः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
ये च वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जनाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये |
६५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
ये च व्रूय़ुस्तवास्मीति ये च स्युः शरणागताः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुनेः |
१३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ये च शस्त्रैर्वधं प्राप्ताः क्षत्रधर्मेण पार्थिवाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
ये च शिष्टान्प्रवाधन्ते धर्मस्तेषां वधः स्मृतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
ये च शिष्टास्त्रय़ो भक्ताः फलकामा हि ते मताः |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
ये च शूरा महात्मानः श्वशुरा मे महारथाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
ये चरन्ति महात्मानो नाकपृष्ठे वसन्ति ते ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्वकल्पय़त् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ये चरन्त्यनभीमाना निसृष्टार्थविभूषणाः |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये चरा ह्यचरानद्युरदंष्ट्रान्दंष्ट्रिणस्तथा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना; यथान्याय़ं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
ये चादौ व्रह्मणा सृष्टा व्राह्मणास्तपसा पुरा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
ये चानाथा दुर्वलाः सर्वकाल; मात्मन्येव प्रय़तन्तेऽथ मूढाः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रिय़ः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
ये चानार्यसमासक्ताः सर्वे ते संशय़ं गताः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ये चानुकीर्तिताः क्षिप्रं तेषां गतिमवाप्नुय़ाम् |
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
ये चान्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः; परिश्रिता ये परितो मनुष्याः |
५ क