वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधु विधीय़ताम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यथा कृष्णेन निहतो मुरो रणनिपातितः |
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा कैकेय़ि सैरन्ध्र्या समेय़ां तद्विधीय़ताम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
यथा कोशान्तरं प्राप्य चन्द्रमा भ्राजते पुनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनोति मधु षट्पदः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यथा क्रुद्धो रणे शक्रो दानवानां क्षय़ं पुरा ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यथा क्षेत्रं मृदूभूतमद्भिराप्लावितं तथा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
यथा खदिरमालम्व्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
यथा गच्छन्ति निरय़मनेकं पुरुषर्षभ ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
यथा गजौ हैमवतौ प्रभिन्नौ; प्रगृह्य दन्ताविव वाशितार्थे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
यथा गणाः प्रवर्धन्ते न भिद्यन्ते च भारत |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
यथा गतिर्न दृश्येत तथा तस्य न संशय़ः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
यथा गतिर्न दृश्येत तथैव सुमहात्मनः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
यथा गव्यं तथा युक्तं पाय़सं सर्पिषा सह |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा गावः स्थितास्तात स्वे स्वे वर्णे तथा प्रजाः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यथा घोरो महानागस्तक्षको वै विषोल्वणः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यथा च कर्णः कौन्तेय़ैः सह युद्धमय़ोजय़त् |
११० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
यथा च कश्चित्परशुं गृहीत्वा; धूमं न पश्येज्ज्वलनं च काष्ठे |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
यथा च कश्चित्सुकृतैर्मनुष्यः; शुभाशुभं प्राप्नुतेऽथाविरोधात् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
धृतराष्ट्र उवाच
यथा च कुन्ती सत्कारं कुर्यान्माद्र्यास्तथा कुरु |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां पराय़णम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
यथा च खं तथा शुद्धो भविष्यति सुतो महान् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
यथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
यथा च गृहिणस्तोषो भवेद्वै वलिकर्मणा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
यथा च जामदग्न्येन कोटिशः क्षत्रिय़ा हताः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
यथा च तदभूद्युद्धं तत्ते वक्ष्यामि शृण्वतः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
व्यास उवाच
यथा च तव धर्मज्ञे धर्मे प्रणिहिता मतिः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे व्रूहि पार्थिव ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
यथा च ते व्रह्मचर्यमिदमादिष्टवान्गुरुः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
यथा च त्वां न पश्येय़ुः कुर्वाणां तेन संविदम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च त्वां न शङ्केरन्परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च त्वाभिनन्दामि वध्वद्य क्षौमसंवृताम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
यथा च दीपः शरणं दीप्यमानः प्रकाशय़ेत् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
यथा च दीर्घमध्वानं पद्भ्यामेव प्रपद्यते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
यथा च देहाच्च्यवते शरीरी; पुनः शरीरं च यथाभ्युपैति ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यथा च द्विषतां हन्ता रणे शान्तस्तदुच्यताम् ||
११० ख
विराट पर्व
अध्याय
४६
द्रोण उवाच
यथा च न पराजय़्यात्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
यथा च नाभिपद्येत कालस्तात तथा कुरु |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
यथा च नावं कौन्तेय़ कर्णधारः समाहितः |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च निहतः सङ्ख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम ||
६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा च पश्चान्निर्मुक्तो ध्रुवं पर्येति रश्मिवान् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यथा च पाण्डवा राजन्नगम्या युधि कस्यचित् ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
यथा च पाण्डुर्भ्राता मे दय़ितो भवतामभूत् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यथा च पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
यथा च पुष्करस्याक्षा वर्तन्ते वशवर्तिनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
व्यास उवाच
यथा च प्राह कौन्तेय़स्तथा धर्मो न संशय़ः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा च भगवानग्निः स्वय़मेवाङ्गिराभवत् |
७ क