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आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वो नात्र भेदः स्यात्तत्कुरुष्व युधिष्ठिर ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वो नात्र भेदः स्यात्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
यथा वो नात्र भेदः स्यात्सर्वेषां द्रौपदीकृते |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
यथा व्यक्तमिदं शेते स्वप्ने चरति चेतनम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा व्रवीति धर्मज्ञो मुनिः सत्यवतीसुतः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यथा व्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
यथा व्राह्मणचण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
यथा व्रूय़ान्महाप्राज्ञो यथा व्रूय़ाद्वहुश्रुतः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
यथा व्रूय़ान्महाप्राज्ञो यथा व्रूय़ाद्विचक्षणः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
यथा व्रूय़ान्महाप्राज्ञो यथा व्रूय़ान्महामतिः |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
यथा वय़ं परे राजन्युद्धाय़ समवस्थिताः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यथा शक्ररथो राजन्युद्धे देवासुरे पुरा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
यथा शक्रसमं पुत्रं जनय़िष्यसि वीर्यवान् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युते ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
यथा शक्रो महाराज पुरा विव्याध दानवम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
यथा शक्रो वज्रपाणिर्दारय़न्पर्वतोत्तमान् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
यथा शङ्खस्य निर्घोषः पाञ्चजन्यस्य श्रूय़ते |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
यथा शत्रून्घातय़ित्वा पुरुषः कुरुसत्तम |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा शन्तनुना गुप्ता राज्ञा चित्राङ्गदेन च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
यथा शरीरं न ग्लाय़ेन्नेय़ान्मृत्युवशं यथा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
यथा शरीरस्योद्देशाः शुचय़ः परिनिर्मिताः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यथा शल्य त्वमात्थेदमेवमेतदसंशय़म् |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
यथा शल्याद्य कर्णोऽय़ं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |
१२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
यथा शापः पुरा दत्तो व्रह्मणा राजधर्मणः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
यथा शाल्वपते नान्यं नरं ध्यामि कथञ्चन |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ५१
ऋत्विज ऊचुः
यथा शास्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
यथा शिलोच्चय़े शैलः सागरे सागरो यथा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
यथा शीतोष्णय़ोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तावुडुराट्छनैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् |
१८९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
यथा शृङ्गं वने दृप्तः खड्गो धारय़ते नृप ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा शैलस्य महतः शैलेनैवाभिजघ्नुषः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
यथा श्येनस्य पतनं वनेष्वामिषगृद्धिनः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
यथा श्राद्धं सम्प्रवृत्तं यस्मिन्काले यदात्मकम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
यथा श्रुतं कथय़तः सकाशाद्वै पितुर्मय़ा ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
यथा श्रुतं च दृष्टं च मय़ा तस्मिंस्तपोवने ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यथा श्रुतं ते वदतो महात्मनो; मधुप्रवीरस्य वचः समाहितम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा श्रुतिरिय़ं व्रह्मञ्जीवः किल सनातनः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात्साधुतश्च ताम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
यथा श्वा भषितुं चैव हन्तुं चैवावसृज्यते |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
यथा श्वेतो महानागो देवराजचमूं तथा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
यथा स तेषां संवादो यस्मिन्स्थानेऽपि चाभवत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
यथा स न्यपतद्द्रोणः सादितः पाण्डुसृञ्जय़ैः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
यथा स पुरुषव्याघ्रो न हन्येत जय़द्रथः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
यथा स भगवान्व्यासः कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
वासुकिरु उवाच
यथा स यज्ञो न भवेद्यथा वापि पराभवेत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
यथा स यज्ञो नृपतेर्निर्वर्तिष्यति सत्तम ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
यथा स वक्ष्यते कृष्ण तथा कर्तास्मि संय़ुगे ||
४७ ख