chevron_left  यथाकालंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः ||
३५ ग
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
यथाकालं तु सा व्रह्मन्प्रजज्ञे भुजगस्वसा |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकालं यथाय़ोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
यथाकाशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थितः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
यथाकाशस्थितो नित्यं वाय़ुः सर्वत्रगो महान् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यथाकाशे शक्रधनुः प्रकाशते; न चैकवर्णं न च विद्म किं नु तत् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
यथाकृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यथाकृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
यथाकृता च भूतेषु प्राप्यते सुखदुःखता |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
जनमेजय़ उवाच
यथाक्रमं च भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वशः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यथाखुः स्याद्विडालश्च श्वा व्याघ्रश्च वलावले |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
भीष्म उवाच
यथाख्यातं भगवता शून्यागारकृतालय़म् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
यथाख्यातमावसतः कुटुम्वं; पुराकल्पात्साधु विलोपमात्थ ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रतिपेदिरे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह सङ्गतः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
यथागतं महाराज मुक्त्वा विषमिवोरगः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
यथागतं मार्गमवेक्षमाणः; पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
यथागतं यय़ौ रामो मामुपामन्त्र्य भारत ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
यथागतं विप्रजग्मुर्विदित्वा पाण्डवान्वृतान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
यथागतं शुभे गच्छ पन्थानं मा विचारय़ ||
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
यथागतेन मार्गेण प्रय़यौ स्वपुरं प्रति ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथागतेन विवुधाः सर्वे काममनोजवाः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
यथागमं च तत्सर्वं वुद्ध्या तन्नैव वुध्यते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
यथागमं यथाज्ञानं निष्ठा नाराय़णः प्रभुः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
यथागमं यथान्याय़ं कर्तव्यं च यथाकृतम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यथागममुपासीत आगमस्तत्र सिध्यति |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
यथागुणं कर्मगणं फलार्थी; करोत्ययं कर्मफले निविष्टः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
यथागुणवलं चापि त्रिवर्गस्य महाफलम् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यथागृहीतमुत्थितं त्वरस्व धर्मपालने ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
यथाग्निः पवनोद्धूतः सूक्ष्मोऽपि भवते महान् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यथाग्निधूमो दिवमेति रुद्ध्वा; वर्णान्विभ्रत्तैजसं तच्छरीरम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
यथाग्निरिन्धनं प्राप्य ज्वलेद्दीप्तार्चिरुल्वणः |
९४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
यथाग्निरिन्धनैरिद्धो महाज्योतिः प्रकाशते |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
यथाग्निहोत्रं सुहुतं साय़ं प्रातर्द्विजातिना |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यथाग्नौ शान्ते घृतमाजुहोति; तन्नैव देवान्न पितॄनुपैति |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
यथाचरितमेवात्र शस्त्रपत्रं विधीय़ते |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
यथाचलं समासाद्य जलौघाः सर्वतोदिशम् |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
यथाचलौ वा गलितौ महावलौ; तथा महास्त्रैरितरेतरं घ्नतः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
यथाज्ञानं तु वक्ष्यामि पुरुषं तं सनातनम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
यथाज्ञापय़से विप्र वाढमेवं भविष्यति |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
यथाञ्जनमय़ो वाय़ुः पुनर्मानःशिलं रजः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यथातत्त्वेन वदतो गुणान्मे कुरुसत्तम ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
यथातिमात्रं कौन्तेय़ः श्रिय़ा परमय़ा युतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
यथातीतानि पश्यन्ति तादृशः सत्त्वसङ्क्षय़ः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
यथातुरस्येव हि पथ्यमन्नं; न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
यथात्थ मां महाराज तत्करिष्यामि ते वचः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
यथात्मनः पश्यति वृत्तमेव; तथा परेषामपि सोऽभ्युपैति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
यथात्मनोऽङ्गं पतितं पृथिव्यां; स्वप्नान्तरे पश्यति चात्मनोऽन्यत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
यथात्मानं प्रार्थय़तेऽर्थमानैः; श्रेय़ःपात्रं पूरय़ते ह्यनल्पम् ||
४१ ख