अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
यद्वृत्तं तीर्थय़ात्राय़ां शपथं प्रति तच्छृणु ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
यद्वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वृत्तं पूर्वराजर्षेर्हय़ग्रीवस्य पार्थिव ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यद्वृत्तिमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवाः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
यद्वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन्प्रतिष्ठितम् |
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
यद्वै कन्यां स्वकन्यार्थे वृतवानसि दुर्मते |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
यद्वै तन्मिथुनं व्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वै तेषां भवेद्योग्यं वधाय़ विवुधद्विषाम् ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यद्वै त्वां नानुगच्छामस्तेन तप्स्यामहे वय़म् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
यद्वै ददाति विप्रेभ्यो व्राह्मणः प्रतिगृह्य वै |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
पशुसख उवाच
यद्वै धर्मे परं नास्ति व्राह्मणास्तद्धनं विदुः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
यद्वै नृशंसं तदपथ्यमाहु; र्यः सेवते धर्ममनर्थवुद्धिः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
यद्वै पुरा जातमात्रो रुराव; गोमाय़ुवद्विस्वरं पापचेताः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
यद्वै प्रोक्तं गुणसाम्यं प्रधानं; नित्यं चैतच्छाश्वतं चाव्ययं च ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यद्वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
यद्वै लोके वैदिकं कर्म साधु; आशीर्युक्तं तद्धि तस्योपभोज्यम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यद्वै व्रूते कुरुमुख्यो महात्मा; देवव्रतः सत्यसन्धो मनीषी |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
यद्वै सूते धातुराद्यं निधानं; तद्वै विप्राः प्रवदन्तेऽनिरुद्धम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यद्वो मनीषितं तद्वै सर्वं सम्पादय़ामि वः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यद्वोऽगमन्मनो मन्दाः कर्णं वैकर्तनं तदा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
यद्वोऽव्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वो; मध्ये कुरूणां हर्षय़न्सत्यसन्धः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्रवीषि जितां कृष्णामजितेति सुमन्दधीः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
यद्व्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्रवीषि सभामध्ये वालः स्थविरभाषितम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
यद्व्रह्मा ऋषय़श्चैव स्वय़ं पशुपतिश्च यत् |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
यद्व्राह्मणमुखाच्छास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
प्रह्राद उवाच
यद्व्राह्मणमुखे कव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्तते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
यद्व्राह्मणस्य कुशलं तदेव सततं वदेत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथय़ामहे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
यद्व्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तय़ेत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
यद्व्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन; तेनर्षिणा तच्च भक्ष्याधिकारम् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
यद्व्राह्मणार्थे विसृजेदात्मानमपि चात्मजम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
यद्व्रूत तच्छ्रुतं सर्वं ममापि शृणुतानघाः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्रूय़ां त्वां महावाहो तत्कृथास्त्वमिहाच्युत ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्व्रूय़ात्तत्तथा कार्यमिति धर्मविदो विदुः ||
२७ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
यद्व्रूय़ात्तत्तथा कार्यमिति वुध्यस्व माधव ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
यद्व्रूय़ात्तव भीष्मो वा धर्मज्ञो वा युधिष्ठिरः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
यद्व्रूय़ाद्धि हृषीकेशो राजानमपराजितम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
यद्व्रूय़ुः कार्य उत्पन्ने स धर्मो धर्मसंशय़े ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यद्वय़ं कौरवान्हत्वा तानि राष्ट्राण्यशीमहि ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
यद्वय़ं त्वां जिघांसामस्त्वं चास्मान्कुरुसत्तम ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वय़ं न तदैवैतान्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यद्वय़ं नानुगच्छामस्त्वां धिगस्मान्नराधमान् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
यद्वय़ं संशितात्मानं प्रलोव्धुं त्वामिहागताः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यदय़ं कत्थते नित्यं हन्ताहं पाण्डवानिति |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यदय़ं व्रूय़ात्तत्कार्यमविचारय़द्भिरिति ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
यदय़ुद्धेन लभ्येत तत्ते वहुमतं भवेत् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
यदय़ुध्यन्स्थिरा भूत्वा महत्या सेनय़ा सह ||
७० ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
यनवैः सहितो राजा भगदत्तो महारथः ||
१२ ख