अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
यथा सुराणाममृतं पितॄणां च यथा स्वधा |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
यथा सूतो लोहिताक्षो महात्मा; पौराणिको वेदितवान्पुरस्तात् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यथा सूर्यस्य गगनादुदय़ास्तमय़ाविह |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
यथा सूर्यांशुभिः स्पृष्टं सर्वं शुचि विभाव्यते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
यथा सूर्योदय़े राजन्समुत्पिञ्जोऽभवन्महान् ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यथा सृगालः सिंहश्च यथा च शशकुञ्जरौ ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सृष्टोऽसि कौन्तेय़ धात्रा कर्मसु तत्कुरु |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सृष्टोऽसि राजेन्द्र तथा भवितुमर्हसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदित्यव्रवीद्वचः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सेना न भज्येत तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
यथा सैन्येन रजसा समुद्धूतेन वाहिनी |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सैरन्ध्रिवेषेण न ते राजन्निदं पुरम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
यथा स्कन्दस्य राजेन्द्र मय़ूरेण विराजता ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
यथा स्थलं च निम्नं च न स्याद्वर्षति वासवे |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
यथा स्थितैरधर्मेण धार्तराष्ट्रैर्विवासिताः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
शमीक उवाच
यथा स्याद्गुणसंय़ुक्तः प्राप्नुय़ाच्च महद्यशः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
राजो उवाच
यथा स्याद्दुष्कृतो दण्डो यथा च सुकृतं कृतम् |
५७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यथा स्याद्विदितं राजंस्तथा कार्यमरिन्दम ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
यथा स्वं वान्तमश्नाति श्वा वै नित्यमभूतय़े |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य कोष्ठं भाण्डमना भवेत् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
यथा स्वल्पं जलं ग्रीष्मे शोषय़िष्याम्यहं तथा ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
यथा हंसा महाराज तडागं प्राप्य भारत ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
यथा हन्यां समागम्य भीष्मं शान्तनवं युधि ||
१० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
दुर्योधन उवाच
यथा हरिहय़ैर्युक्तं सङ्गृह्णाति स मातलिः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
यथा हवींषि जुह्वाना मखे वै लुव्धकर्त्विजः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यथा हि कनकं शुद्धं तापच्छेदनिघर्षणैः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
७
विराट उवाच
यथा हि कामस्तव तत्तथा कृतं; महानसे त्वं भव मे पुरस्कृतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि किरणा भानोस्तपन्तीह चराचरम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
यथा हि गङ्गा सरितां वरिष्ठा; तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यथा हि गङ्गा सरितां वरिष्ठा; तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रिय़ं मनसोऽनुगम् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यथा हि गोवृषो वर्षं प्रतिगृह्णाति लीलय़ा |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
यथा हि गोवृषो वर्षं सन्धारय़ति खात्पतत् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
यथा हि जलदं भित्त्वा राजन्सूर्यस्य रश्मय़ः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
यथा हि ते मय़ा प्राणाः सङ्गृहीता नरेश्वर |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासय़ति तेजसा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
यथा हि दृश्यते सर्वं दैवय़ोगेन सञ्जय़ ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
यथा हि पुरुषः खात्वा कूपमप्राप्य चोदकम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा हि पुरुषः शालां पुनः सम्प्रविशेन्नवाम् |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
यथा हि पुरुषश्छिन्द्याद्वृक्षं परशुना वने |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यथा हि पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा; व्यूहः कृतः कौरवनन्दनेन |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यथा हि भगवानग्निर्जगद्दग्ध्वा चराचरम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
यथा हि भगवान्रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
यथा हि मुखवर्णोऽय़मनय़ोरिति मेनिरे |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यथा हि मे गुरोर्वाक्यं विशिष्टं द्विपदां वर |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३६
यवक्रीरु उवाच
यथा हि मे भवान्मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ||
१७ ख