द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
यथा चैतन्न जानीय़ात्स राजा पृथिवीपतिः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
युधिष्ठिर उवाच
यथा चैवाभवद्युद्धं तच्चाचक्ष्व पितामह |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा चैवोक्तवान्भीमस्त्वामुद्दिश्य सवान्धवम् |
४० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
यथा चोक्तं तथा चैव कर्तव्यं भूतिमिच्छता ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यथा चोत्तापितं वीजं कपाले यत्र तत्र वा |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
यथा चोपेक्षितोऽस्माभिर्वहुशः कृतविप्रिय़ः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
यथा छाय़ातपौ नित्यं सुसम्वद्धौ निरन्तरम् |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदविन्दुभिः |
९७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रं भरते सदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
यथा जन्मप्रभृति वै यतात्माहं धृतव्रतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
यथा जातस्तु पुरुषः प्रपद्यति तदुच्यताम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वाय़ोर्वृकोदरः |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
यथा जीर्णमजीर्णं वा वस्त्रं त्यक्त्वा तु वै नरः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यथा जीवन्ति ते पौत्राः प्रीतिमन्तः परस्परम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
यथा जीवन्न वः कश्चिन्मुच्यते युधि सृञ्जय़ः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
यथा जीवाः प्रकृतौ वध्यमाना; धर्माश्रितानामुपपीडनाय़ |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
अर्जुन उवाच
यथा जीवेत्पाण्डवोऽहं च कृष्ण; तथा वुद्धिं दातुमद्यार्हसि त्वम् ||
६३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
यथा ज्ञाने परिचय़ः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
यथा ज्येष्ठः कनिष्ठेषु वर्तते भरतर्षभ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यथा जय़द्रथं पार्थो न हन्यादिति संय़ुगे ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
यथा जय़ार्थं सङ्ग्रामे न जह्याम परस्परम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
युधिष्ठिर उवाच
यथा जय़ार्थिनः सेनां नय़न्ति भरतर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यथा तत्त्वाभिगमनादर्थं तस्य स विन्दति ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
यथा तथा वोऽस्तु नमश्च वोऽस्तु; ममापि च स्वस्ति दिशन्तु विप्राः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
यथा तथैनं पश्यन्ति न नित्यं प्राकृता जनाः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
युधिष्ठिर उवाच
यथा तदनृतं तस्य भवेत्तद्वत्समाचर ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यथा तदभवद्युद्धं कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
७५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वसुदेव उवाच
यथा तदभवद्युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
यथा तन्न भवेत्सत्यं तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
यथा तमांस्यभ्युदितस्तमोघ्नः; पूर्वां प्रतिज्ञां समवाप्य वीरः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
यथा तव निरर्थोऽय़मारम्भस्त्रिदशेश्वर |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तव प्रिय़ं राजंश्चिकीर्षामि परन्तप ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यथा तव सुतानां च पाण्डवानां च भारत ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तां वुद्धिमास्थाय़ गतिमग्र्यां गमिष्यसि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
यथा तासां च मन्येत श्रेय़ आत्मन एव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
यथा तिलानामिह पुष्पसंश्रय़ा; त्पृथक्पृथग्याति गुणोऽतिसौम्यताम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
यथा तिष्ठेत वै कश्चिद्गोचक्रस्यान्तरा नरः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्च दद्यात्स पार्थिवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तु कथितस्तत्र नारदेन तथा शृणु ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यथा तु पुरुषव्याघ्रैर्युद्धं परमसङ्कटम् |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
यथा तु पुरुषो राजन्दीर्घमध्वानमास्थितः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
यथा तु भग्ना द्रोणेन वातेनेव महाद्रुमाः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
अगस्त्य उवाच
यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय़ ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
यथा तु युद्धमेव स्यात्तथा कार्यमरिन्दम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तु विपिने न्यस्तान्भ्रातॄन्राज्यपरिच्युतान् ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
यथा तुदसि मर्माणि वाक्षरैरिह नो भृशम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तुष्टो महादेवो देवराजश्च तेऽनघ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
यथा तूर्णं व्रजत्येष परलोकाय़ माधवः ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा ते कुलतन्तुश्च धर्मश्च न पराभवेत् |
२२ क