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शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
या गतिर्या परा निष्ठा या शान्तिः पुण्यकर्मणाम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
या गतिर्युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
या गतिर्व्रह्मभवने सा गतिस्त्वं सनातन ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
या गाथाः सम्प्रगाय़न्ति कुर्वन्तोऽध्ययनं यथा |
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
या च तत्र फलावाप्तिरृषिभिः समुदाहृता ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
या चैव फलनिर्वृत्तिः सौहृदे चैव यत्सुखम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
या चैषा विश्रुता राजंस्त्रैलोक्ये साधुसंमता |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
या तु त्यागेन शान्तिः स्यात्तदृते वध एव सः |
६७ क
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
या तु त्वय़ि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
या तु धर्मविलोपेन मर्यादाभेदनेन च |
१० क
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
या तु भर्तरि शुश्रूषा तय़ा स्वर्गमुपाश्नुते ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
या ते शक्तिर्वलं चैव तत्क्षिप्रं मय़ि दर्शय़ |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ||
५३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वासुदेव उवाच
या त्वं पुत्रं दुरात्मानमीर्षुमत्यन्तमानिनम् |
२ क
विराट पर्व
अध्याय २३
सैरन्ध्र्यु उवाच
या त्वं वससि कल्याणि सदा कन्यापुरे सुखम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीर्मानय़सेऽनघे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
या त्वाहं चन्दनादिग्धमपश्यं सूर्यवर्चसम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
या त्वेवम्भाविनी नारी सा भवेद्धर्मभागिनी ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
या देवतासु वृत्तिस्ते सास्तु विप्रेषु सर्वदा |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
या न जातु स्वय़ं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मनः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ६४
कर्ण उवाच
या नः श्रुता मनुष्येषु स्त्रिय़ो रूपेण संमताः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
या नः स्नुषाः सञ्जय़ वेत्थ तत्र; प्राप्ताः कुलेभ्यश्च गुणोपपन्नाः |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
या नापश्यच्चन्द्रमा नैव सूर्यो; रामाः कदाचिदपि तस्मिन्नरेन्द्रे |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
या नारी प्रय़ता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
या नारी भर्तृपरमा भवेद्भर्तृव्रता शिवा ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संय़मी |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
या नो भार्याः सञ्जय़ वेत्थ तत्र; तासां सर्वासां कुशलं तात पृच्छेः |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
या परित्यज्य राज्यं स्वं गुरुशुश्रूषणे रता ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
या पश्यामि हतान्पुत्रान्पौत्रान्भ्रातॄंश्च केशव |
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
अर्जुन उवाच
या प्रीतिर्धर्मराजे मे भीमे च वदतां वरे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
या भवेन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षय़े |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
या मे प्रीतिः पाण्डवेषु भूय़ः सा त्वय़ि माधव |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
या मे प्रीतिस्त्वय़ाख्याता कीचकस्य समागमे |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
या मे सम्भावना तात त्वय़ि नित्यमवर्तत |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
या या विक्रिय़ते संस्था ततः सापि प्रणश्यति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
या या विक्रिय़ते संस्था ततः साभिप्रपद्यते ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
या याः पतिकृताँल्लोकानिच्छन्ति परमस्त्रिय़ः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
या वभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
या वा त्वं सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
या विभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
या वीरपत्नी गुरुभिर्निय़ुक्तापत्यजन्मनि ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
या वृत्तिः स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
या वै त्वा कौशिकैर्वस्त्रैः शुभ्रैर्वहुधनैः पुरा |
१४ क