आदि पर्व
अध्याय
१६४
वैशम्पाय़न उवाच
य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
य एष गोप्ता प्रतपन्वलस्थो; यो नः सेनां सिंह इवेक्षते च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
य एष चन्द्रार्कसमानतेजा; जघन्यजः पाण्डवानां प्रिय़श्च |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
य एष जाम्वूनदशुद्धगौर; तनुर्महासिंह इव प्रवृद्धः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
य एष जाम्वूनदशुद्धगौरः; प्रचण्डघोणस्तनुराय़ताक्षः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
य एष तु रथानीके सुवर्णकवचावृतः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
य एष तुमुलः शव्दः श्रूय़ते लोमहर्षणः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
य एष द्रौपदो राजंस्तव सैन्ये महारथः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
य एष पृथुदीर्घाक्षः पीतवासा जनार्दनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
य एष मत्तर्षभतुल्यगामी; महद्धनुः कर्षति तालमात्रम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
पितर ऊचुः
य एष मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
य एष रक्तपद्माक्षः पीतवासा महाभुजः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
य एष राजा-राजेति शव्दश्चरति भारत |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
अर्जुन उवाच
य एष वल्लवो व्रूते सूदस्तव नराधिप |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
य एष वृक्षं तरसावरुज्य; राज्ञां विकारे सहसा निवृत्तः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
य एषामभवद्द्वीपः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
य ऐरावतराजानः सर्पाः समितिशोभनाः |
१३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
य चान्ये क्रतवस्तात व्राह्मणैरभिपूजिताः |
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
य चाप्यर्धरथा राजन्पाण्डवानामतः शृणु ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
य चास्यावभृथे स्नान्ति केचिदेवंविधा नराः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
य चैनमन्ववर्तन्त भ्रातरो वलदर्पितम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वृषपर्वो उवाच
यं काममभिकामासि देवय़ानि शुचिस्मिते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
यं कालं नागतो राजन्गुरुस्तस्य महात्मनः |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
यं कीर्तय़ित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
३९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
यं कृत्वा मुनय़ो यान्ति सिद्धिं स्वतपसा शुभे ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यं गङ्गा गर्भविधिना धारय़ामास पार्थिवम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वृषपर्वो उवाच
यं च कामय़ते कामं देवय़ानी करोतु तम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
यं च धर्मं चरिष्यन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्तेषु प्रतिष्ठितम् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
यं चातिमानुषं वीर्ये कृत्स्नो लोको व्यवस्यति |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यं चापराधं कृतवानज्ञानात्परमेश्वर |
१६५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
यं चासूय़न्ति राजानः पुरुषं न वदेच्च तम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यं चैव धर्मं कुरुते तस्य पुण्यफलं च यत् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
घटोत्कच उवाच
यं जनाः सम्प्रवक्ष्यन्ति यावद्भूमिर्धरिष्यति ||
५८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
यं जित्वा तप्यते पश्चादापन्न इव दुर्मतिः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेय़ात्मने नमः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
यं ज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धिं गच्छन्ति परमर्षय़ः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं ज्ञानिनोऽधिगच्छन्ति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यं तं कार्ष्णिप्रतिमं प्राहुरेकं; स सात्यकिः पाण्डवार्थे निविष्टः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
यं तं देवगणाः सर्वे हृष्टरूपा अपूजय़न् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं तं व्यक्तस्थमव्यक्तं विचिन्वन्ति महर्षय़ः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
यं तु धीरोऽन्ववेक्षेत श्रेय़ांसं वहुभिर्गुणैः |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
यं तु पश्यसि नो व्रह्मन्वीरणस्तम्वमाश्रितान् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति वुद्ध्या संविभजन्ति तम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
यं तु सर्वमनुष्येभ्यः प्राहुः शूरतरं नृपम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
यं त्वमेनं साय़कं घोररूपं; विषेण दिग्धं मम सन्दधासि |
७६ क