द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यदि शत्रुं त्वमात्मानं मन्यसे तत्तथास्त्विह |
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
यदि शत्रुवधे न्याय़्यो भवेत्कर्तुं च पाण्डवैः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
यदि शास्त्रं प्रमाणं ते माभक्ष्ये मानसं कृथाः ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि शिष्योऽसि मे तूर्णं वेतनं सम्प्रदीय़ताम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
यदि शुध्यति कालेन तस्मादज्ञानसागरात् ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
यदि शुश्रूषसे पार्थ शृणु कारन्धमं नृपम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
यदि शूरस्तथा क्षेमे प्रतिरक्षेत्तथा भय़े |
१६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
यदि श्रान्तोऽसि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमर्हसि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
यदि स जय़ति मां महाहवे; तत इदमस्तु सुकत्थितं तव ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
यदि संन्यासतः सिद्धिं राजन्कश्चिदवाप्नुय़ात् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
यदि संस्तौषि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
यदि सङ्कल्पमात्रेण भुङ्क्ते भोगान्यथार्थवत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यदि सत्यपि लिङ्गेऽस्मिञ्ज्ञानमेवात्र कारणम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चय़ाद्भाषितं त्वय़ा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यदि सन्तं सेवते यद्यसन्तं; तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
यदि सन्तं सेवते यद्यसन्तं; तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि सम्पत्स्यसे पुत्रैः सहामात्यैर्नराधिप ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
यदि सम्भावनीय़ं ते गच्छ शीघ्रमरिन्दम |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यदि सर्वमवुद्धीनामतिक्रान्तममेधसाम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
यदि सर्वानभिप्राय़ान्कर्तासि मम पार्थिव ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवो नो विजय़ो भवेत् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यदि सा रक्तनेत्रान्ता चित्राङ्गी मधुरस्वरा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
यदि साध्याश्च रुद्राश्च वसवश्च सहाश्विनः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि सापि दुरात्मानं शमय़ेद्दुष्टचेतसम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि साम्ना न मोक्षध्वं गन्धर्वा धृतराष्ट्रजम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
अर्जुन उवाच
यदि साम्ना न मोक्ष्यन्ति गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
यदि सेवन्ति धर्मांस्तानाप्नुवन्ति तपःफलम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
यदि सौभपतिर्भद्रे निय़ोक्तव्यो मते तव |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेय़ः पश्येत्तथाचरेत् |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
द्रोण उवाच
यदि स्थास्यति सङ्ग्रामे मुहूर्तमपि मेऽग्रतः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यदि स्थास्यसि सङ्ग्रामे क्षत्रधर्मेण सौवल ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यदि स्म कुरवः सर्वे जय़ेय़ुः सर्वपाण्डवान् |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि स्म धर्मराज्ञा वा भीमसेनेन वा पुनः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
यदि स्म वलिना व्रह्मञ्शून्यागारे समेय़िवान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
यदि स्यात्कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
यदि स्यात्पुरुषः कर्ता शक्रात्मश्रेय़से ध्रुवम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
यदि स्यादपराधीनं पुरुषस्य क्रिय़ाफलम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रिय़ाफलम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२११
अर्जुन उवाच
यदि स्यान्मम वार्ष्णेय़ी महिषीय़ं स्वसा तव ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
यदि स्युर्न हताः पूर्वमिदानीं स्युर्भय़ङ्कराः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
यदि स्वर्गे परं स्थानं धर्मतः परिमार्गसि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि स्वस्ति प्रजाय़न्ते जाता जीवन्ति वा यदि |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यदि हि त्वं पुरा द्यूतात्कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
यदि हि स निहतः शय़ीत भूमौ; यदुकुलपाण्डवनन्दनो महात्मा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
यदि हि स्यात्सकवचस्तथैव च सकुण्डलः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
यदि हि स्याद्गदापाणिर्जरासन्धः प्रतापवान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते जनाधिप |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
व्रह्मो उवाच
यदि ह्यकामामासेवेत्स्त्रिय़मन्यामपि ध्रुवम् |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि ह्यग्निश्च वाय़ुश्च धर्म इन्द्रोऽश्विनावपि |
६ क