आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
यत्रेमं तु सहस्राक्ष निक्षिपेय़महं स्वय़म् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेमा वसतीः सर्वा वसेमाविदिताः परैः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेमाः शरदः सर्वाः सुखं प्रतिवसेमहि ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
यत्रेष्टं गम्यतां तत्र कृतकार्या वय़ं त्वय़ा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
यत्रेष्टं तत्र देय़ा स्यान्नात्र कार्या विचारणा |
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षसहस्रकैः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
यत्रेष्ट्वा दश पद्मानि सदस्येभ्यो निसृष्टवान् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्ट्वा भगवाञ्ज्योतिर्भास्करो राजसत्तम |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्ट्वा भगवान्स्थाणुः पूजय़ित्वा सरस्वतीम् |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्ट्वा स गतः सिद्धिं सहस्राक्षः शचीपतिः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्ट्वा सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यत्रैतत्सुमहच्छत्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
यत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स व्राह्मणः स्मृतः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
यत्रैते सतनुत्राणाः सुय़ोधनपुरोगमाः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यत्रैते सतलत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिताः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रैनमन्वय़ाद्भीमो वाय़ुवेगसमो जवे |
१२४ क
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
यत्रैनामभ्यवर्तन्त दिव्याः पुण्याः समुद्रगाः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रैव कृष्णेन रणे निर्जितः परवीरहा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यत्रैव च कुमारेण वाल्ये क्षिप्ता दिवौकसः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
यत्रैव हि वसेद्दान्तस्तदरण्यं स आश्रमः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रैवं गुणसम्पन्नानस्मान्व्रूथ विमत्सराः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
यत्रैष शव्दस्तत्राश्वांश्चोदय़ेति पुनः पुनः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यत्रैष शव्दस्तुमुलः पर्जन्यनिनदोपमः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
यत्रैष शव्दस्तुमुलस्तत्र सूत रथं नय़ ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
यत्रैषा काञ्चनी वेदी प्रदीप्ताग्निशिखोपमा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यत्रोत्तरां दिशं गत्वा शैलराजस्य पार्श्वतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्रोत्तराः कुरवो भान्ति रम्या; देवैः सार्धं मोदमाना नरेन्द्र |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रोत्सृष्टः स भगवान्गङ्गय़ा गिरिमूर्धनि |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवय़ा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्रोपय़ाति हरिभिः सोमपीथी; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यत्रोवाच जगत्स्कन्दः क्षिपन्वाक्यमिदं तदा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वय़ा चन्द्रनिभानने |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
यत्स नागाय़ुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
यत्स पुष्पाण्युपादाय़ हस्ताभ्यां ममृदे शनैः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
यत्संशोचसि कौरव्य वर्तमाने जनक्षय़े |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
यत्सभाय़ां त्वय़ा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
यत्सभाय़ां स्म पाञ्चालीं क्लिश्यमानां दुरात्मभिः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
यत्सभाय़ां हसन्नस्मांस्तदा वदसि दुर्मते |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्समर्थं पाण्डवानां तत्करिष्यामि मा शुचः |
११६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्समुत्सृज्य राज्यं सा वनवासमरोचय़त् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
यत्समेत्य रणे पार्थैः पुत्रो मम निपातितः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
यत्सर्वेष्विह लोकेषु दय़ा कौरवनन्दन ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
यत्सहाय़ान्मृगय़से धर्मार्थकुशलाञ्शुचीन् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
यत्सादिनो वारणांश्च रथांश्चैकोऽजय़द्युधि ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीय़ते |
४७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
यत्सुता विधवा वाला स्नुषाश्च निहतेश्वराः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
यत्सुरापं तु तस्यासीद्वक्त्रं त्रिशिरसस्तदा |
३८ क