भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ नरेन्द्रैः सह सोदरैश्च; समाप्तकर्मा शिविरं निशाय़ाम् |
१२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
यय़ौ निकृत्तनासोष्ठी लङ्कां भ्रातुर्निवेशनम् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ प्रकर्षन्महतीं वाहिनीं सुरराडिव ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ भागिरथीकच्छं हरिभिर्भृशवेगितैः |
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
यय़ौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिपः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ मातङ्गराजेन राजार्हेण पताकिना |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
यय़ौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ रथानां पुरतो हि सा चमू; स्तथैव पश्चादतिमात्रसारिणी |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ रथेनाप्रतिमप्रभेण; पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ रथेनालय़माशु देव्याः; पाञ्चालराजस्य च यत्र दाराः ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ राजंस्ततो रामो वकस्याश्रममन्तिकात् |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ राजा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो वनं तदा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ विमृद्नंस्तरसा पदातीन्वाजिनस्तथा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ वैकर्तनः कर्णः प्रमुखे सर्वधन्विनाम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ वैकर्तनः कर्णस्तूर्णमाय़ोधनं प्रति ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ व्यासं पुरस्कृत्य नृपो रत्ननिधिं प्रति ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ शान्तनवं भीष्मं पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
यय़ौ स धर्मराजाय़ न्यवेदय़त चापि तम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ सपत्नान्प्रति जातकोपो; वृतः समग्रेण वलेन भीष्मः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ सरस्वतीतीरे काम्यकं नाम काननम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
यय़ौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धय़े ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यय़ौ स्वभवनं राजा गान्धार्यानुगतस्तदा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
यय़ौ स्वमेव भवनं युक्तः परमय़ा मुदा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
यय़ौ स्वशिविरं राजा निशाय़ां सेनय़ा वृतः ||
४६ ख