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शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
यो वा ह्यस्थिरसङ्कल्पो वुद्धिमानागतागमः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
यो वाकथय़मानस्य आत्मानं नानुसञ्ज्वरेत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यो वाजिनं गर्भमपां पुराणं; वैश्वानरं वाहनमभ्युपेतः |
१५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
यो वाल एव समरे संमितः सव्यसाचिना |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
यो वासुदेवो भगवान्क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
यो विकर्मस्थितो विप्रो न स सन्मानमर्हति |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
यो विचिन्त्य धिय़ा सम्यग्व्यवस्यति स वुद्धिमान् ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
यो विद्यया तपसा जन्मना वा; वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यो विद्याच्चतुरो वेदान्साङ्गोपनिषदान्द्विजः |
२३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
यो विद्वान्सहवासं च विवासं चैव पश्यति |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
यो विभेद चमूमेको मम पुत्रस्य दुर्भिदाम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
शुक उवाच
यो विशिष्टश्च धर्मेभ्यस्तं भवान्प्रव्रवीतु मे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
यो विश्वसति मित्रेषु न चाश्वसति शत्रुषु |
१३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
यो वीभत्सोर्हृदय़े प्रौढ आसी; दस्थिप्रच्छिन्मर्मघाती सुघोरः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
यो वेत्ति न तमाघ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विषः ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
यो वेत्ति पुरुषव्याघ्र स भुनक्ति महीमिमाम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
यो वेद धर्मानखिलान्यथावच्चरितव्रतः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यो वेद मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
धृतराष्ट्र उवाच
यो वेद मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
यो वेद वेदान्न स वेद वेद्यं; सत्ये स्थितो यस्तु स वेद वेद्यम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यो वेदिता कर्मणः पापकस्य; तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोषि ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
यो वै कश्चिदिहाजातः क्षत्रिय़ः क्षत्रधर्मवित् |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
यो वै गृहेभ्यः प्रवसन्प्रिय़ाणां नानुसंस्मरेत् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
यो वै जय़त्यधर्मेण क्षत्रिय़ो वर्धमानकः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
यो वै तं पुरुषं वेद तस्येहात्मा न रिष्यते |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
वन्द्यु उवाच
यो वै दर्पात्संहननोपपन्नः; सुदुर्वलः पर्वतमाविहन्ति |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
यो वै द्यूते धनं जित्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रय़च्छति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २५४
द्रौपद्यु उवाच
यो वै न कामान्न भय़ान्न लोभा; त्त्यजेद्धर्मं न नृशंसं च कुर्यात् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
यो वै न देवान्न पितॄन्न मर्त्यान्हविषार्चति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये; नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
प्रह्लाद उवाच
यो वै प्रश्नं न विव्रूय़ाद्वितथं वापि निर्दिशेत् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
यो वै प्रिय़तरो राजन्सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
यो वै प्रिय़सुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
कृप उवाच
यो वै मूर्धावसिक्तानामग्रे यातः परन्तपः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
अष्टक उवाच
यो वै विद्वान्वय़सा सन्स्म वृद्धः; स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यो वै सर्वान्महीपालान्वशे चक्रे धनुर्धरः |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
यो वैश्यः स्याद्वहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यो व्यराजच्चमूमध्ये दिवाकर इव प्रभुः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
यो व्यस्य वेदांश्चतुरस्तपसा भगवानृषिः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
यो व्रह्म जानाति यथाप्रदेशं; स्वाध्याय़नित्यः शुचिरप्रमत्तः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
यो व्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
यो व्रह्मण्यो द्वितीय़ोऽस्ति त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
यो व्रह्मदेय़ां तु ददाति कन्यां; भूमिप्रदानं च करोति विप्रे |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
यो व्राह्मणविरोधेन सुखं जीवितुमुत्सहेत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
कुन्त्यु उवाच
यो व्राह्मणस्य साहाय़्यं कुर्यादर्थेषु कर्हिचित् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
कापव्य उवाच
यो व्राह्मणान्परिभवेद्विनाशं वापि रोचय़ेत् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
यो व्राह्मणोऽद्य प्रभृतीह कश्चि; न्मोहात्सुरां पास्यति मन्दवुद्धिः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
यो व्रूय़ाच्चापि शिष्याय़ धर्म्यां व्राह्मीं सरस्वतीम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
यो हन्ति भूतैर्भूतानि मोहय़ित्वात्ममाय़या ||
३१ ख