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आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं कर्णदुर्योधनाभ्यां; वुद्धिं कृतां निग्रहे केशवस्य |
११९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं कर्णमत्यन्तशूरं; हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् |
१४६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं कर्णमासाद्य मुक्तं; वधाद्भीमं कुत्सय़ित्वा वचोभिः |
१३९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं कलहद्यूतमूलं; माय़ावलं सौवलं पाण्डवेन |
१४९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं कश्मलेनाभिपन्ने; रथोपस्थे सीदमानेऽर्जुने वै |
१२४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं घोषय़ात्रागतानां; वन्धं गन्धर्वैर्मोक्षणं चार्जुनेन |
११२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं चास्मदीय़ान्महारथा; न्व्यवस्थितानर्जुनस्यान्तकाय़ |
१३१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनञ्जय़ं; शक्रात्साक्षाद्दिव्यमस्त्रं यथावत् |
११० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं देवराजं प्रवृष्टं; शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं देवराजेन दत्तां; दिव्यां शक्तिं व्यंसितां माधवेन |
१४१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रं कृपं च; दुःशासनं कृतवर्माणमुग्रम् |
१४७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रादिभिस्तै; र्हतान्पाञ्चालान्द्रौपदेय़ांश्च सुप्तान् |
१५३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रोणपुत्रेण गर्भे; वैराट्या वै पात्यमाने महास्त्रे |
१५६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रोणमाचार्यमेकं; धृष्टद्युम्नेनाभ्यतिक्रम्य धर्मम् |
१४३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रौणिना द्वैरथस्थं; माद्रीपुत्रं नकुलं लोकमध्ये |
१४४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्रौपदीमश्रुकण्ठीं; सभां नीतां दुःखितामेकवस्त्राम् |
१०६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं द्वारकाय़ां सुभद्रां; प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन |
१०३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं धनुराय़म्य चित्रं; विद्धं लक्ष्यं पातितं वै पृथिव्याम् |
१०२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं नरनाराय़णौ तौ; कृष्णार्जुनौ वदतो नारदस्य |
११७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं नागवलैर्दुरुत्सहं; द्रोणानीकं युय़ुधानं प्रमथ्य |
१३८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं निर्जितस्याधनस्य; प्रव्राजितस्य स्वजनात्प्रच्युतस्य |
११६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं निहतं मद्रराजं; रणे शूरं धर्मराजेन सूत |
१४८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं पाण्डवांस्तिष्ठमाना; न्गङ्गाह्रदे वासुदेवेन सार्धम् |
१५१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं भीमसेनानुय़ातेन; अश्वत्थाम्ना परमास्त्रं प्रय़ुक्तम् |
१५४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं भीष्ममत्यन्तशूरं; हतं पार्थेनाहवेष्वप्रधृष्यम् |
१२६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं भीष्मममित्रकर्शनं; निघ्नन्तमाजावय़ुतं रथानाम् |
१२५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं मन्त्रिणं वासुदेवं; तथा भीष्मं शान्तनवं च तेषाम् |
१२१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं माधवं वासुदेवं; सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टम् |
११८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं मामकानां वरिष्ठा; न्धनञ्जय़ेनैकरथेन भग्नान् |
११४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं यक्षरूपेण धर्मं; समागतं धर्मराजेन सूत |
११३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं वासुदेवार्जुनौ तौ; तथा धनुर्गाण्डिवमप्रमेय़म् |
१२३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं वासुदेवे प्रय़ाते; रथस्यैकामग्रतस्तिष्ठमानाम् |
१२० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं वाहनेष्वाश्वसत्सु; रथोपस्थे तिष्ठता गाण्डिवेन |
१३७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं विविधांस्तात मार्गा; न्गदाय़ुद्धे मण्डलं सञ्चरन्तम् |
१५२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं विविधास्तात चेष्टा; धर्मात्मनां प्रस्थितानां वनाय़ |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं वैश्रवणेन सार्धं; समागतं भीममन्यांश्च पार्थान् |
१११ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं व्यूहमभेद्यमन्यै; र्भारद्वाजेनात्तशस्त्रेण गुप्तम् |
१३२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं व्रह्मशिरोऽर्जुनेन; मुक्तं स्वस्तीत्यस्त्रमस्त्रेण शान्तम् |
१५५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं शरतल्पे शय़ानं; वृद्धं वीरं सादितं चित्रपुङ्खैः |
१२७ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं शान्तनवे शय़ाने; पानीय़ार्थे चोदितेनार्जुनेन |
१२८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं शुक्रसूर्यौ च युक्तौ; कौन्तेय़ानामनुलोमौ जय़ाय़ |
१२९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं श्रान्तमेकं शय़ानं; ह्रदं गत्वा स्तम्भय़ित्वा तदम्भः |
१५० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं श्रान्तहय़े धनञ्जय़े; मुक्त्वा हय़ान्पाय़यित्वोपवृत्तान् |
१३६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं सत्कृतां मत्स्यराज्ञा; सुतां दत्तामुत्तरामर्जुनाय़ |
११५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं सैन्धवार्थे प्रतिज्ञां; प्रतिज्ञातां तद्वधाय़ार्जुनेन |
१३५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं स्नातकानां सहस्रै; रन्वागतं धर्मराजं वनस्थम् |
१०८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषं हृतराज्यं युधिष्ठिरं; पराजितं सौवलेनाक्षवत्याम् |
१०५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषमभिमन्युं निहत्य; हर्षान्मूढान्क्रोशतो धार्तराष्ट्रान् |
१३४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यदाश्रौषमर्जुनो देवदेवं; किरातरूपं त्र्यम्वकं तोष्य युद्धे |
१०९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
यदासां निहताः पुत्रा युवानो मृष्टकुण्डलाः ||
१६ ख