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विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्ता भूस्त्वं नरश्रेष्ठ योत्स्येऽहं कुरुभिः सह ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
यन्तारं मद्रराजस्य निर्विभेद ततो हृदि ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
यन्तारमव्रवीच्छूरः शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यन्तारमव्रवीत्कर्णः पाञ्चालानेव मा वह ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
यन्तारमव्रवीद्राजन्भीमं प्रति नय़स्व माम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
यन्तारमस्य सहसा त्रिभिर्वाणैः समर्पय़त् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
यन्तुं नात्मा शक्यते पौरुषेण; मानेन वीर्येण च तात नद्धः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
यन्तुः प्रेष्यकरा राजन्राजपुत्रमुदावहन् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
यन्तुरेव शिरः काय़ात्क्षुरप्रेणाहरत्तदा ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्त्रं वैहाय़सं चापि कारय़ामास कृत्रिमम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्त्रच्छिद्रेणाभ्यतिक्रम्य लक्ष्यं; समर्पय़ध्वं खगमैर्दशार्धैः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
यन्त्रतोमरतूणीरैः पताकाभिश्च शोभिताः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
यन्त्रवद्धा विकवचा व्रणार्ता रुधिरोक्षिताः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्त्रस्येवेह शव्दोऽभून्महांस्तस्य पुनः पुनः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यन्त्राणि विविधान्येव क्रिय़ास्तेषां च वर्णिताः |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
यन्त्रितः कार्यकरणे षड्भागकृतलक्षणः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
यन्त्रैरुद्घाटय़ामास सोऽपश्यत्तत्र वालकम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
यन्त्रैश्च परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
यन्त्रैश्च वहुधा छिन्नैस्तोमरैश्च सकम्पनैः ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्त्रोत्क्षिप्त इव क्षिप्रमुत्तस्थौ सर्वतो जनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
यन्न क्षरति पूर्वेण यावत्कालेन चाप्यथ ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यन्न तस्य मनो ह्यासीत्त्वय़ोक्तस्य हितं वचः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
यन्न देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः |
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
यन्न पश्यति तद्भूतं मुच्यते स महाभय़ात् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्न पश्यामि दुर्धर्ष मम पुत्रसुतं विभो ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
यन्न पश्यामि वीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भय़ादपि |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
यन्न विद्मः परं देवं शाश्वतं यं विदुर्वुधाः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
इन्द्राण्यु उवाच
यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
यन्नः कुन्तीसुता वीरा भर्तारः पुनरागताः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
यन्नः क्षमं महावाहो तद्व्रवीह्यविचारय़न् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
यन्नः प्राव्राजय़ः सौम्य अजिनैः प्रतिवासितान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
यन्नाहमद्य मृदिता हस्तिय़ूथेन दुःखिता |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ३४
व्रह्मो उवाच
यन्निमित्तं च भविता मोक्षस्तेषां महाभय़ात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
यन्निमित्तं भवेच्छोकस्तापो वा दुःखमूर्छितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
यन्निमित्तं भवेच्छोकस्त्रासो वा दुःखमेव वा |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत्प्रतापवान् |
९८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत्प्रतापवान् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशव्दवत् |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
यन्नैव मधु शक्राय़ धारय़न्त्यमरस्त्रिय़ः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
यन्नो नीचैरल्पवलै राज्यमाच्छिद्य भुज्यते ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
यन्नोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरपि ध्रुवम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
यन्मतं धार्तराष्ट्रस्य लुव्धस्यादीर्घदर्शिनः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
यन्मन्त्रशव्दैरकृतप्रकाशं; तदुच्यतां मे भगवन्यथावत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
यन्मन्त्रशव्दैरकृतप्रकाशं; तदुच्यमानं शृणु मे परं यत् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
यन्मन्त्रे भवति वृथा प्रय़ुज्यमाने; यत्सोमे भवति वृथाभिषूय़माणे |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
धृतराष्ट्र उवाच
यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व; श्रेय़स्करं व्रूहि तद्वै कुरूणाम् ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यन्ममास्ति धनं किञ्चिदर्जुनस्य च वेश्मनि |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
यन्मा क्षत्ताव्रवीत्तात प्रपश्यन्पुत्रगृद्धिनम् |
१२ क