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अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
यूय़ं नित्यं पुण्यकर्मोपवाह्या; दिशध्वं मे गतिमिष्टां प्रपन्नाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
यूय़ं भङ्गाश्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुताः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
यूय़ं भूमौ विनिक्षिप्य पुत्रस्नेहविनाकृताः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशय़ः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं यज्ञैरिज्यमानाः समाप्तवरदक्षिणैः |
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं लोकान्धारय़ध्वं यज्ञभागफलोदिताः |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
यूय़ं विहतसङ्कल्पाः शोचन्तो वर्तय़िष्यथ ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
शकुनिरु उवाच
यूय़ं वय़ं वा विजिता वसेम वनमाश्रिताः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
यूय़ं सर्वान्वधिष्यध्वं तत्र मे नास्ति संशय़ः |
३५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं सर्वे सुरसमा येन युद्धे समासिताः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
यूय़ं ससुहृदः पार्थाः सर्वे सरथवाहनाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं हि भाविता लोके सर्वय़ज्ञेषु मानवैः |
५८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
यूय़मिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन्नृपतेस्तदा ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
ये कीर्तिमिच्छन्ति कुले विशिष्टां; त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
ये केचन गतास्तस्य समीपमपलाय़िनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
ये केचन स्वध्ययनाः प्राप्ता यजनय़ाजनम् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
ये केचिज्जन्तवो लोके जङ्गमाः स्थावराश्च ह |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
ये केचित्तान्न रक्षन्ति तैरर्थो नास्ति कश्चन ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ये केचित्पार्थिवास्तत्र धार्तराष्ट्रेण संवृताः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
ये केचित्सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
ये केचिद्भूमिपतय़स्तान्सर्वानन्ववेक्षय़ेत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
ये केचिद्विस्तरेणोक्ता निय़मा व्रह्मचारिणः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
ये क्रोधं नैव कुर्वन्ति क्रुद्धान्संशमय़न्ति च |
२० क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
ये क्लिश्यमानां प्रेक्षन्ते धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्या; ञ्शक्ता भूत्वा सततं पुण्यशीलाः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
ये क्षरन्ति सदा क्षीरं षड्रसं ह्यमृतोपमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
ये खल्वजिह्वाः कृपणा अल्पप्राणा अपाणय़ः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
ये गताः पाण्डवं युद्धे क्रोधामर्षसमन्विताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
ये गताः पृथिवीं त्यक्त्वा इति ज्ञात्वा विमुच्यते ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ये गुणाः कीर्तिता लोके धर्मकामार्थसम्भवाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
ये गुणाः पुरुषस्येह ये च मातृगुणास्तथा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
ये गुप्ताश्चैव दुर्गाश्च देशास्तेषु प्रवेशय़ेत् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
ये गुरूनुपसेवन्ते निय़ता व्रह्मचारिणः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ये गृद्धा भारते वर्षे न मृष्यन्ति परस्परम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
ये च कर्णमुखा राजन्रथोदाराः प्रकीर्तिताः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
ये च कालमुखा नाम नरा राक्षसय़ोनय़ः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
ये च कृष्णे गुणाः स्फीताः पाण्डवेषु च ये गुणाः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
ये च केचन पार्थानामभिय़ाता धनञ्जय़म् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
ये च केचन राजानः पृथिव्यां योद्धुमागताः |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
ये च केचन लोकेऽस्मिन्नर्थाः संशय़कारकाः |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय २
भीम उवाच
ये च केचिन्निय़ोत्स्यन्ति समाजेषु निय़ोधकाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
ये च क्रतुभिरीजानाः श्रुतवन्तश्च भूमिपाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
ये च क्रीणन्ति दासीवद्ये च विक्रीणते जनाः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
ये च क्रूरेषु सर्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
ये च गाः सम्प्रय़च्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्च ये |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
ये च छिन्दन्ति वृषणान्ये च भिन्दन्ति नस्तकान् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
ये च तत्र मृतास्तेषां सुहृदोऽर्चन्तु तानपि ||
१३ ख