शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
यदि तेऽनुग्रहकृता मय़ि वुद्धिः पुरन्दर |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
युधिष्ठिर उवाच
यदि तेऽनुग्रहे वुद्धिरस्मास्विह सतां वर |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
यदि तेऽनुमतं राजन्किं वान्यन्मन्यते भवान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तेऽहं प्रिय़ा पार्थ वहूनीमान्युपाहर |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
यदि तेऽहं प्रिय़ो राजञ्जहि मां मा चिरं कृथाः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि तेऽहमनुग्राह्या यदि तेऽस्ति कृपा मय़ि |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
भीम उवाच
यदि तेऽहमनुग्राह्यो दर्शय़ात्मानमात्मना ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सह केशव |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
यदि त्वं नेच्छसि त्यक्तुं शरीरं पश्य वै द्विज |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
यदि त्वनुग्रहं कञ्चित्त्वत्तोऽर्होऽहं जनार्दन |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि त्वपत्यसन्तानं कुन्तिराजसुता मय़ि |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यदि त्वमरविन्दाक्ष दय़ावान्न जिघांससि ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
देवय़ान्यु उवाच
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यदि त्वर्थेन मे कार्यं व्रूहि किं करवाणि ते |
१७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
यदि त्वसुकरं लोके कर्म कुर्याम संय़ुगे |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
यदि त्वस्त्राणि मुञ्चेय़ं महान्ति समरे स्थितः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
यदि त्वहं त्वा दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरवेषु दय़ा यदि |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
यदि त्वहमनुग्राह्यस्तव धर्मभृतां वर |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यदि त्वहमनुग्राह्यो भवतो दय़ितोऽपि वा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
यदि त्वां ससुतं पापं न हन्यां युधि रोषितः |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
यदि त्वां सासुरसुराः सय़क्षोरगराक्षसाः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
यदि त्वामनुपश्यामि परस्य प्रिय़वादिनम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
यदि त्वामापगेय़ो वै न नय़ेद्गजसाह्वय़म् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
यदि त्विच्छसि सङ्ग्रामे द्रष्टुमेनं विशां पते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्यं स्यात्कृतं मय़ा ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
यदि त्वेतन्मय़ा कार्यं मृगेन्द्रो यदि मन्यते |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमिहेच्छसि |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
यदि त्वेवं कथञ्चित्स्याल्लोकपर्यसनं यथा |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
यदि त्वय़ुद्धमिष्टं वो वय़ं शान्त्यै यतामहे ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
यदि दक्षः समारम्भात्कर्मणां नाश्नुते फलम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
ऐल उवाच
यदि दण्डः स्पृशते पुण्यभाजं; पापैः पापे क्रिय़माणेऽविशेषात् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि दण्डान्न विभ्येय़ुर्वय़ांसि श्वापदानि च |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मय़ा यदि |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
यदि दत्तं यदि हुतं गुरवस्तोषिता यदि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
यदि दत्तं यदि हुतं विद्यते यदि नस्तपः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
यदि दद्यामहं राज्यं तुष्टो वै यस्य कस्यचित् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
यदि दास्यसि कर्ण त्वं सहजे कुण्डले शुभे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
यदि दास्यामि ते देव कुण्डले कवचं तथा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
यदि दास्यामि ते मार्गं सैन्यस्य व्रजतोऽऽज्ञय़ा |
४० क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यदि दुर्योधनस्यैते वीरलोकाः सनातनाः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
यदि देय़मवश्यं वै मातङ्गोऽहं महाद्युते |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यदि देय़ो वरो मह्यं यदि तुष्टश्च मे प्रभुः |
१८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीय़ाद्युधिष्ठिरम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासवः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
यदि धर्मः श्रुतो विप्र सहैव फलमस्तु नौ ||
८१ ख