आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र द्यूतार्णवे मग्नान्द्रौपदी नौरिवार्णवात् |
१०२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि न म्रिय़े ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र द्रोणश्च भीष्मश्च कृपः कर्णो विविंशतिः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
युधिष्ठिर उवाच
यत्र द्रोणस्तथा भीष्मो द्रौणिर्वैकर्तनः कृपः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र धर्मं समाश्रित्य विदुरः सुगतिं गतः |
२१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
यत्र धर्ममनाशङ्काश्चरेय़ुर्वीतमत्सराः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
यत्र धर्मश्च यज्ञश्च तत्रेय़ं निवसेदिति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनिः कितवोऽजय़त् ||
१०१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो महावलः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवानुवर्णितः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र धर्मो महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर |
८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
यत्र धाता विधाता च वरुणश्चोर्ध्वमागताः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
यत्र ध्वनिं शृणोष्येनं तूष्णीमास्स्व विशां पते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यत्र नाराय़णो देवः परमात्मा सनातनः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
यत्र नावृत्तिमभ्येति शाश्वतांस्तान्सनातनान् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
यत्र नास्ति पदन्यासः कस्तं विषय़माप्नुय़ात् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
यत्र नास्ति वलात्कारः स राजा तीव्रशासनः |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र नास्ति शरैः कार्यं न मित्रैर्न च वन्धुभिः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र नाहं न मे माता विप्रय़ुज्येत जीवितात् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यत्र नित्यं निवसति श्रीमान्कमललोचनः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यत्र नित्यं समाय़ान्ति लोकस्य हितकाम्यया ||
६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
यत्र नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम् |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१९६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
यत्र नैव शरैः कार्यं न भृत्यैर्न च वन्धुभिः |
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र पापसहाय़ोऽय़ं पापो राज्यं वुभूषते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यत्र पापा ज्ञाय़मानाश्चरन्ति; सतां कलिर्विन्दति तत्र राज्ञः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
यत्र पार्थो महाराज भीमसेनश्च पाण्डवः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
यत्र पूर्वं प्रसूता वै दाक्षाय़ण्यः प्रजाः स्त्रिय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
यत्र पूर्वाभिसर्गेण धर्मचक्रं प्रवर्तितम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चय़म् |
२०१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र प्रविश्य नगरं छद्मभिर्न्यवसन्त ते |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र प्रविष्टमात्रो वै पापेभ्यो विप्रमुच्यते ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नन्दति पुण्यकर्मा; यत्र प्रेतः शोचति पापकर्मा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
यत्र भागीरथी गङ्गा भजते दिशमुत्तराम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भागीरथी पुण्या सदस्यासीद्युधिष्ठिर ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भीमो गदापातैस्तवोरुं भेत्स्यते वली ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावय़त वाहिनीम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यत्र भीष्मः शान्तनवो हतः स्या; द्यत्र द्रोणः सहपुत्रो हतः स्यात् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र भीष्ममुखाञ्शूरानस्त्रज्ञान्योधसत्तमान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णो विविंशतिः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र भीष्मस्य द्रोणस्य कृपस्य च महात्मनः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
यत्र भीष्मो महावाहुः शेते शरशताचितः ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भूतपतिः सृष्ट्वा सर्वलोकान्सनातनः |
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भूय़ो निववृते प्राङ्मुखा वै सरस्वती |
३५ क