chevron_left  युद्धमेतत्त्वशेषेणarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय २
धृतराष्ट्र उवाच
युद्धमेतत्त्वशेषेण शृणुय़ां तव तेजसा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
युद्धशास्त्रविदेव त्वं न वृद्धाः सेवितास्त्वय़ा |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्च मानवाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
युद्धशौण्डः सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
युद्धशौण्डो महावाहुर्नित्योद्यतशरासनः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
युद्धशौण्डौ समाहूतावरिभिस्तौ रणाध्वरम् |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय़ जीवितस्य च संय़ुगे ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
युद्धश्रद्धां रणे छिन्द्यां जीवितस्य च सूतज ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
युद्धश्रद्धां स तेऽद्याहं विनेष्यामि महाहवे ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धस्यान्तमभीप्सन्वै वेगेनाभिजगाम तम् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
युद्धात्कर्णमपक्रान्तं किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
युद्धाद्भीतस्ततस्तोय़ं प्रविश्य प्रतितिष्ठसि ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
युद्धानां च विशेषज्ञौ प्रणेतारौ च सर्वशः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
दुर्योधन उवाच
युद्धानामपि पर्याय़ो भवत्वनुमते तव ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
युद्धान्यासन्महाराज घोराणि च वहूनि च ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
युद्धाभिकामाञ्शूरांश्च पश्य माधव दंशितान् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
युद्धाभिकामौ समरे क्रीडन्ताविव यूथपौ |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतामघवर्धनम् ||
३१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धाभिमानिनः प्रीता जीवन्त इव विभ्रति ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वनः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
युद्धार्थिनौ तु विज्ञाय़ विवुद्धः पुरुषोत्तमः ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धार्थी वाशिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
युद्धावचारिकं यत्तु तच्छीघ्रं संविधीय़ताम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
युद्धावहारिकं यच्च पितुः स्यात्स हरेच्च तत् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
युद्धाय़ क्षत्रिय़ः सृष्टः सञ्जय़ेह जय़ाय़ च |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
युद्धाय़ च मतिं चक्रूरावेशं च परं यय़ुः ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
युद्धाय़ समवर्तन्त समाहूय़ेतरेतरम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
युद्धाय़ सहसा राजन्पराक्रान्तौ परस्परम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
युद्धाय़ापततस्तूर्णं वारितान्सव्यसाचिना |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
युद्धाय़ाभ्यद्रवन्वीराः कुरूणां नवती रथाः |
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
युद्धाय़ामर्षताम्राक्षः समाहूय़ धनञ्जय़म् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धाय़ावस्थितं पार्थं पार्थिवैरतिमानुषैः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे कृष्ण कलिर्नित्यं प्राणाः सीदन्ति संय़ुगे |
४९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धे क्षत्रिय़धर्मे च निरतोऽय़ं वृकोदरः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
युद्धे तु क्षत्रिय़ांस्तात पाण्डवानां जय़ैषिणः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
युद्धे तु सन्त्यजन्प्राणाञ्शक्रस्यैति सलोकताम् ||
१२ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धे पराजितो वासि गतश्रीरिव लक्ष्यसे ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
युद्धे प्रतीपमाय़ान्तमपि साक्षात्पुरन्दरः ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
युद्धे मनः समाधाय़ याहि याहीत्यचोदय़त् ||
२६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
युद्धे यश्च परित्राता सोऽपि स्वर्गे महीय़ते ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत्परिरक्षसि ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
युद्धे विनाशः कृत्स्नस्य कुलस्य भविता ध्रुवम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
युद्धे विनाशः क्षत्रस्य गाण्डीवेन प्रदृश्यते ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
युद्धे विनिहतः शूरो विसृजन्साय़कान्वहून् ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
युद्धे सङ्कर्षणसमो वलेनाभ्यधिको भुवि |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
युद्धे सत्यधृतिं क्षैमिमवहन्प्रांशवः शुभाः ||
४८ ख